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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


इस बार वैष्णवी हँसी। बोली, “एकाएक इतना दर्द हो आया गुसाईं। अच्छा, चलो। मैं डलिया ले आऊँ, इतने में तुम हाथ-मुँह धोकर कपड़े बदल लो।”

आश्रम के बाहर थोड़ी दूर पर फूलों का बगीचा है। घने छायादार आम्र-वन के भीतर से रास्ता है। सिर्फ अन्धकार के कारण ही नहीं बल्कि सूखे पत्तों के ढेरों के कारण पथ की रेखा विलुप्त हो गयी है। वैष्णवी आगे-आगे और मैं पीछे-पीछे चला, तो डर लगने लगा कि कहीं साँप पर पैर न पड़ जाय।

कहा, “कमललता, रास्ता तो नहीं भूलोगी?”

“नहीं, कम-से-कम आज तो तुम्हारे लिए रास्ता पहचानकर चलना पड़ेगा।”

“कमललता, एक अनुरोध रखोगी?”

“कौन-सा अनुरोध?”

“यहाँ से तुम और कहीं नहीं जाओगी।”

“जाने से तुम्हारा क्या नुकसान है?”

जवाब नहीं दे सका, चुप हो रहा।

मुरारी ठाकुर ने कहा है कि “हे सखी, अपने घर लौट जाओ, जिसने जीते हुए भी मर कर अपने को खो दिया है, उसे तुम अब क्या समझती हो?” गुसाईं, शाम को तुम कलकत्ते चले जाओगे, और अब यहाँ शायद एक प्रहर से ज्यादा ठहर न सकोगे- क्यों?”

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