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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


सन्देह हुआ कि अर्थ काफी साफ नहीं है, पर यह कहने का साहस भी नहीं हुआ कि स्पष्ट करके कहो। वह मृदु स्वर से गुनगुनाने लगी-

गले में श्याम माणिकों की मंजु मालाएँ डालूँगी,

और कानों में नवकुण्डल, श्याम-गुण-यश के धारूँगी।

श्याम के ही अनुराग-रँगे, पीत पट सुन्दर पहनूँगी,

योगिनी बन करके बन बन, और पथ पथ पर भटकूँगी

कहे यदुनाथदास-

गीत रोकना पड़ा। कहा, “यदुनाथदास को रहने दो, उधर झल्लीरी की आवाज सुन रही हो, लौटोगी नहीं?” उसने मेरी ओर देखकर मृदु हास्य से फिर शुरू कर दिया-

धर्म औ कर्म सभी जावें, नहीं डरती हूँ मैं इससे।

कहीं इस चक्कर में पड़कर, हाथ धो बैठूँ प्रीतमसे ।।

“अच्छा, नये गुसाईं, जानते हो कि बहुत से भले आदमी औरतों का गाना नहीं सुनना चाहते, उन्हें बहुत बुरा लगता है?”

मैंने कहा, “जानता हूँ। किन्तु मैं उन 'भले बर्बरों' में नहीं हूँ।”

“तो बाधा डालकर मुझे रोका क्यों?”

“उधर तो शायद आरती शुरू हो गयी है- तुम्हारे न रहने से उसमें कमी रह जायेगी।”

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