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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


द्वारिकादास ने कुण्ठित स्वर में कहा, “उस पर नाराज होना गुसाईं, सुना है कि ये सब तुम्हारी सेवा नहीं कर सकीं और बीमार पड़कर तुमसे बहुत काम लिया, अनेक कष्ट भी दिये। यह कल मुझसे इसके लिए स्वयं ही दु:ख प्रकट कर रही थी। और फिर वैष्णव-बैरागियों के पास सेवा-सत्कार करने लायक है ही क्या। किन्तु अगर कभी तुम्हारा यहाँ आना हो तो भिखारियों को दर्शन दे जाना। दे जाओगे न गुसाईं?”

सिर हिलाकर बाहर निकला आया, कमललता वहीं पर वैसी ही खड़ी रही। पर अकस्मात् यह क्या हो गया! बिदा लेने के वक्त न जाने कितना क्या कहने और सुनने की कल्पना कर रक्खी थी - सब नष्ट कर दी। अनुभव कर रहा था कि चित्त की दुर्बलता की ग्लानि अन्तर में धीरे-धीरे संचित हो रही है, किन्तु स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि झुँझलाया हुआ असहिष्णु मन ऐसी अशोभन रुक्षता से अपनी मर्यादा नष्ट कर बैठेगा!

नवीन आ पहुँचा। वह गौहर की तलाश में आया है, क्योंकि, वह कल से अब तक घर नहीं लौटा है। बड़ा अचरज हुआ, “यह क्या नवीन, वह तो यहाँ भी अब नहीं आता?”

नवीन विशेष विचलित न हुआ। बोला, “तो किसी बन-जंगल में घूम रहे होंगे, नहाना-खाना बन्द कर दिया है, अब कहीं साँप के काटने की खबर मिलेगी तो निश्चिन्त हुआ जायेगा।”

“पर नवीन, उसकी तलाश करना तो जरूरी है।”

“मालूम है कि जरूरी है, पर तलाश कहाँ करूँ? बाबू, जंगल में घूम घूमकर मैं अपनी जान तो दे नहीं सकता! पर वे कहाँ हैं? एक बार उनसे और पूँछ लूँ।”

“ 'वे' कौन?”

“वही कमललता।”

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