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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


चाहे जहाँ भी रहूँ, पूँटू के बहू-भात के समय पहुँचकर अन्न ग्रहण करने का वादा किया था और भागे हुए गौहर को खोज लाना मेरा कर्त्तव्य है। इतने दिनों तक अनावश्यक अनुरोध बहुत माने हैं, पर आज जब सच्चा कारण विद्यमान है तब मान्य करने को कोई नहीं। देखा, पद्मा आ रही है। करीब आकर बोली, “तुम्हें एक बार दीदी बुला रही हैं, गुसाईं।”

फिर लौट आया। आँगन में खड़े होकर वैष्णवी ने कहा, “कलकत्ते पहुँचने में तुम्हें रात हो जायेगी, नये गुसाईं। ठाकुरजी का थोड़ा-सा प्रसाद सजा रक्खा है, कमरे में आओ।”

रोज की तरह सावधानी से तैयारी की गयी थी। बैठ गया। यहाँ खाने के लिए मनाने और जोर डालने की प्रथा नहीं है, आवश्यक होने पर माँग लेना होता है। बाकी नहीं छोड़ा जाता।

जाने के वक्त वैष्णवी ने कहा, “नये गुसाईं, फिर आओ न?”

“तुम रहोगी न?”

“तुम बताओ, मुझे कितने दिन तक रहना होगा?”

“तुम ही बताओ कि कितने दिनों बाद मुझे यहाँ आना होगा?”

“नहीं, यह मैं तुम्हें नहीं बताऊँगी।”

“न बताओ, पर एक दूसरी बात का जवाब दोगी, बोलो?”

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