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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


और पड़ी हुई पास के ही छींके पर वैसी ही दुर्दशा में वह रंगीन हँड़िया जिसे देखते ही मुझे यह बात याद आ गयी कि इसमें उसके आलते के बंडल रहते थे। और भी इधर-उधर क्या-क्या पड़ा था, अन्धकार में पता नहीं पड़ा। वे सब चीजें मिलकर प्राणपण से मुझे न जाने किस बात का इंगित करने लगीं, पर उस भाषा से मैं अनजान था। कुछ ऐसा लगा कि मकान के एक कोने में मानो किसी मृत शिशु का खिलौना-घर है। घर-गृहस्थी की नाना टूटी-फूटी चीजों से यत्नपूर्वक सजाए हुए इस क्षुद्र संसार को वह छोड़ गया है। आज उन चीजों का आदर नहीं है, प्रयोजन भी नहीं, आँचल से बार-बार झाड़ने-पोंछने की जरूरत भी नहीं-पड़ा हुआ है सिर्फ जंजाल, इसलिए कि किसी ने उसे मुक्त नहीं किया है।

वह कुत्ता कुछ देर तक साथ-साथ आया और ठहर गया। जब तक दिखाई पड़ा तब तक बेचारा इस ओर टकटकी लगाये खड़ा देखता रहा है। उसके साथ का यह परिचय प्रथम भी है, और अन्तिम भी। फिर भी वह कुछ आगे बढ़कर बिदा देने आया है। मैं जा रहा हूँ किसी बन्धुहीन, लक्ष्यहीन प्रवास के लिए, और वह लौट जायेगा अपने अन्धकारपूर्ण निराले टूटे हुए मकान में! दोनों के ही संसार में ऐसा कोई नहीं है जो राह देखते हुए प्रतीक्षा कर रहा हो!

बगीचे के पार ही जाने पर वह आँखों से ओझल हो गया, परन्तु पाँच ही मिनट के इस अभागे साथी के लिए हृदय भीतर ही भीतर रो उठा, ऐसी दशा हो गयी कि आँखों के आँसू न रोक सका।

चलते-चलते सोच रहा था कि ऐसा क्यों होता है? और किसी दिन यह सब देखता तो शायद कुछ विशेष खयाल न आता, पर आज मेरा हृदयाकाश मेघों के भार से भारातुर हो रहा है- जो उन लोगों के दु:ख की हवा से सैकड़ों धाराओं में बरस पड़ना चाहते हैं।

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