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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


राजलक्ष्मी ने मेरे कान पर मुँह रखकर धीरे-धीरे न जाने क्या कहा, अच्छी तरह से समझ में नहीं आया। कहा, “जरा जोर से कहो तो सुनाई दे।”

राजलक्ष्मी ने कहा, “नहीं।”

इसके बाद वह अवश भाव से उसी तरह पड़ी रही। सिर्फ उसके उष्ण धन नि:श्वास मेरे गले पर और मेरे गालों पर आकर पड़ने लगे।

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“अजी, उठो। कपड़े बदलकर हाथ-मुँह धो लो। रतन चाय लिये खड़ा है।”

मेरा उत्तर न पाने पर राजलक्ष्मी ने फिर पुकारा, “कितनी देर हो गयी है- अब कब तक सोओगे?”

करवट बदलकर मैंने अवश कण्ठ से कहा, “तुमने सोने ही कब दिया? अभी अभी तो सोया हूँ।”

इतने में कानों में चाय की कटोरी की आवाज पहुँची जिसे रतन मेज पर रखकर शायद लज्जा के मारे भाग गया था।

राजलक्ष्मी ने कहा, “छी छी, तुम कितने बेहया हो। आदमी को झूठमूठ ही अप्रतिभ कर सकते हो! खुद रातभर कुम्भकर्ण की तरह सोये, बल्कि मैं ही जागकर पंखा करती रही कि गर्मी से कहीं तुम्हारी नींद न खुल जाय और मुझसे ही अब ऐसा कहते हो! जल्दी उठो, नहीं तो ऊपर पानी डाल दूँगी।”

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