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वापसी

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :348
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9730

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सदाबहार गुलशन नन्दा का रोमांटिक उपन्यास

''जी नहीं, लाइटर है।

''लाओ, वही चलेगा।''

रशीद पहले तो लाइटर देने से झिझका लेकिन जब पूनम के पिता ने आग्रह किया तो वह इंकार न कर सका। लाइटर हाथ में आते ही उसने झट उसे जला लिया और मेज़ पर बिछी हुई बारूद में आग लगा दी। लाइटर के शोले के छूते ही बारूद भक़ से जल उठा। उसकी लपटें रशीद के चेहरे तक पहुंची ही थी कि पूनम की चिल्लाहट सुनाई दी। वह झपटकर मेज़ तक पहुंची और पांव से चप्पल उतारकर उसने वह आग बुझा दी। फिर पिता की ओर मुड़ती हुई गुस्से से बोली-''यह क्या डैडी...अभी सारे घर को आग लग जाती तो?'' फिर उसके हाथ में रशीद का लाइटर देखकर रशीद की ओर देखती हुई बोली-''ओह...तो यह आपका लाइटर है। आपने क्यों दिया यह इन्हें?''

''मुझे क्या मालूम था कि यह सचमुच बारूद है।'' रशीद ने झेंपते हुए कहा।

''बारूद यह स्वयं बना लेते हैं। इसीलिए में इनसे माचिस छिपाती फिरती हूं। लाइये लाइटर मुझे दे दीजिए, वर्ना घर में आग लगा देंगे आप। उसने पिता के हाथ से लाइटर छीनते हुए कहा।

''मैं तंग आ गया हूं इस यू० एन० ओ० से। जब भी दो मुल्कों में जंग छिड़ती है, यह सीज़ फ़ायर करा देती है।'' पूनम के पिता ने बड़बड़ाकर कहा।

''अच्छा चलिए अपने कमरे में। अब तो सीज़ फ़ायर हो गया।'' पूनम ने कहा और उन्हें घसीटती हुई उनके कमरे में ले गई। फिर जब वह वापिस आई तो रशीद ने उसे करुण दृष्टि से देखकर कहा-''बड़ा कठिन जीवन है तुम्हारा...। तुम इन्हें अकेले घर में छोड़कर बाहर कैसे जाती होगी।''

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