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वापसी

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :348
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9730

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सदाबहार गुलशन नन्दा का रोमांटिक उपन्यास

कर्नल चौधरी जो नशे की तरंग में थे, रशीद की बोर कर देने वाली बात सुनकर खिसककर दूसरी ओर चले गए। रशीद मुस्करा कर जवान अफ़सरों के एक झुरमुट में जा मिला। वह किसी से कुछ बात कर रहा था कि अचानक उसकी पीठ पर धीरे से उंगली का टहूका लगा। रशीद ने झट पलटकर देखा। रुख़साना जान के साथ खड़ी मुस्करा रही थी। वह लोग अभी-अभी पार्टी में आये थे। रशीद ऐसी घनिष्टता से उन्हें मिला, मानो बहुत देर के बिछड़े दोस्तों से मिला हो। फिर वह संकेत से उन्हें एक एकांत कोने में ले गया।

''सब ठीक है न मेजर? आप कुछ परेशान से मालूम होते हैं।'' जान ने धीरे से पूछा।

''You have to be careful...John.'' रशीद ने इधर-उधर देखते हुए धीमे स्वर में कहा।

''क्यों...क्या हुआ?''

''भारत सरकार को हमारे रिंग का पता चल गया है।''

''वह कैसे?'' रुख़साना ने घबराकर पूछा।

''इसका भेद जानने के लिए उन्होंने कैप्टन गुरनाम को यहां भेजा है।''

''लेकिन आपको कैसे पता चला?'' रुख़साना ने जल्दी से पूछा।

''गुरनाम, रणजीत का दोस्त है न-वह मुझे रणजीत समझकर मेरे यहां ही ठहरा हुआ है।''

''तो यह उसी ने आपको बताया?'' जान ने चिंतित स्वर में पूछा।

''हां...और यह भी कि उस रिंग के बारे में तहकीकात करने यहां आया है जो कश्मीर में पाकिस्तान के लिए जासूसी कर रहा है। वह यहां ड्यूटी पर है, लेकिन रहेगा सिविलियन ड्रेस ही में।''

''तो अब हमें क्या करना होगा?''

''ज़रा होशियार रहना होगा। आदमी चालाक और तज़ुर्बेकार है। मिलिट्री में आने से पहले यह इंटेलीजेंस ब्यूरो में था।''

''क्यों न हम अपना अड्डा यहां से बदल दें।'' रुख़साना ने राय दी।

''कोई ज़रूरत नहीं है।'' जान झट बोल उठा-''सिर्फ़ कोड नंबर मालूम होने से क्या होता है। पीर बाबा पर किसी को शक नहीं हो सकता। देखते हैं, अगर ज़रूरत समझेंगे तो अड्डा बदल दिया जाएगा।''

''यह ठीक है।'' रशीद ने उनका साहस बढ़ाने के लिए कहा और फिर मुस्कराते हुए बोला-''चलो, तुम्हें उस जासूस से मिला दूं, जो तुम्हारी ही खोज में कश्मीर आया है।''

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