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गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :348
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9730

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सदाबहार गुलशन नन्दा का रोमांटिक उपन्यास

इससे पहले कि लोग इस झगड़े का कारण जान पाते, रशीद झपटकर उनके पास जा पहुंचा। उसने गुरनाम से जान का गिरेबान छुड़ाया और उसे खींचता हुआ हाल से बाहर ले जाने लगा। गुरनाम रशीद के साथ घिसटता हुआ चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था-''क्रिस्तान है... साला... अंग्रेजों का पिट्ठू... इसे निकालो यहां से... बाहर निकालो।''

रशीद उसे खींचता हुआ बाहर बग़ीचे में ले आया और उसे शांत करने के लिए बोला-''हां-हां-तुम ठीक कहते हो गुरनाम...यह अपने-आपको अंग्रेज़ ही समझता है। तुम चिंता मत करो...मैं उसका दिमाग़ ठीक कर दूंगा।''

''केवल दिमाग़ ही ठीक मत करो-मार डालो साले को...जान से मार डालो।''

''हां-हां, मार डालूंगा...अच्छा तुम अब जाओ...घर जाकर आराम करो।'' यह कहते हुए रशीद ने उसे ले जाकर अपनी जीप-गाड़ी में बिठा दिया। फिर उसने इधर-उधर देखा तो कुछ दूर बरामदे में उसे शाहबाज़ खड़ा दिखाई दिया। रशीद ने उसे बुलाकर गुरनाम को घर छोड़ आने का आदेश दिया। शाहबाज़ उसकी बात सुनकर कुछ दुविधा में पड़ गया तो रशीद बोल उठा-''घबराओ मत...मैं जानता हूं, तुम सिंधु साहब के ड्राइवर हो न...मैं उनसे कह दूंगा...तुम्हें अपने काम से भेजा है।''

शाहबाज़ ने रशीद की जीप में बैठकर स्टेयरिंग संभाल लिया। गुरनाम ने मुश्किल से नशे से बोझिल आंखें खोलकर शाहबाज़ को देखा और लड़खड़ाती आवाज़ में बोला-''यह...कौन...है?''

''दोस्त...दुश्मन नहीं।'' रशीद ने उसके कोट के बटन ठीक करते हुए शाहबाज़ को संकेत किया और उसने जीप आगे बढ़ा दी। रशीद ने संतोष की सांस ली और मैस में लौट आया।

जान और रुख़साना के पास आकर उसने क्षमा मांगी-''आई एम सारी जान...उसने बहुत पी ली थी।''

''इट्स आल राइट...कसूर मेरा ही था जो उससे उलझ गया।''

''क्या बात हुई थी?'' रशीद ने झगड़े का मूल कारण जानना चारा।

''यों ही...नशे की तरंग में रुख़साना से कुछ कह बैठा था।''

''दरअसल शराब उसकी कमज़ोरी है। पीने लग जाता है तो भूल जाता है... वह कहां है?... क्या कर रहा है?''

''कौन था वह रणजीत?'' पूनम ने बीच में आकर मधुर स्वर में पूछा।

''अपना दोस्त गुरनाम।''

''कौन गुरनाम?''

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