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वापसी

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :348
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9730

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सदाबहार गुलशन नन्दा का रोमांटिक उपन्यास

''लेकिन ऐसा तुमने क्यों किया?'' रशीद अपने क्रोध को दबा न सका और बोला-''तुम नहीं जानतीं, यह लाकिट मुझे कितना प्रिय है। इसमें मेरे दोस्त का प्यार और पवित्र भावनाएं गुंथी हुई हैं।''

''तो क्या हुआ...अल्लाह और ओम् में अंतर ही क्या है?'' पूनम ने उसे समझाना चाहा।

''अंतर नहीं है तो तुम्हें पिघलवाने की क्या जरूरत थी। इससे तो यही स्पष्ट होता है कि तुम भी संकीर्ण मन की हो... मुसलमानों से घृणा करती हो।''

''मुझे तो किसी जाति से घृणा नहीं...लेकिन मैं यह देख रही हूं कि पाकिस्तान में रह आने के बाद आपको हिन्दू धर्म से ज़रूर घृणा हो गई है। आपके विचार और दृष्टिकोण बदल गए हैं।''

रशीद को अनुभव हुआ, जैसे पूनम ने उसकी दुखती रग पर उंगली रख दी हो...उसने अपने आपको संभाला और बोला- ''अच्छा, रहने दो अब...जो कुछ हुआ, वह हो गया।''

''नहीं। अब तो आपको 'अल्लाह' वाला लाकिट ही पहनना होगा।'' पूनम ने कहा और अपने पर्स में से वह लाकिट निकाल कर रशीद के हाथ में थमा दिया और उसे ध्यान से देखते हुए फिर बोली-''मैंने तो केवल आपकी परीक्षा लेने के लिए लाकिट बदला था।''

''कैसी परीक्षा?'' वह लाकिट को उंगलियों से टटोलते हुए घबरा कर बोला।

''यही कि आपको एक दोस्त अधिक प्रिय है या प्रेमिका।'' पूनम ने कहा और फिर अचानक कूद कर जीप गाड़ी से नीचे उतर गई।

रशीद ने आवाज़ देकर उसे रोकने का प्रयत्न किया, लेकिन पूनम ने पलट कर नहीं देखा और उस पगडंडी पर चलने लगी जो उसके मकान की ओर जाती थी। जब तक पूनम दृष्टि से ओझल नहीं हो गई, रशीद वहीं खड़ा उसे देखता रहा।

पलट कर जब उसने जीप गाड़ी को देखा तो इंजन पर पेड़ के तने की ठोकर लगने से गाड़ी से खौलता हुआ पानी बाहर आ चुका था और भाप ठंडी हवा में मिलती जा रही थी।

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