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वापसी

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :348
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9730

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सदाबहार गुलशन नन्दा का रोमांटिक उपन्यास

''सोच रहा हूं? जल्दी छुट्टी ले लूं और कुछ दिनों के लिए मां के पास चला जाऊं।

''इरादा बुरा नहीं, लेकिन वहां भी काफ़ी होशियारी बरतनी पड़ेगी।''

''उसका सब प्रबंध कर लिया है। लच्छू राम सिपाही जो अपने रिंग के लिए काम करता है, उसी गांव का रहने वाला है। वह जाकर मुझे सब खबर ला देगा। घर का पूरा पता और मां की आदतों की पूरी जानकारी लेकर आएगा।''

''अब बताओ, उस पार्सल का क्या होगा? कैसे पता चले कि उसमें क्या है?''

''मैंने तो कोशिश की थी कि वह आज शाम मेरे यहां गुज़ारे, लेकिन वह कल पर टाल गया। मैंने जोर देना मुनासिब न समझा कि कहीं उसे शक न हो जाए।''

''वैसे आपके दोस्त की कमज़ोरी क्या है?'' जान ने सिगरेट का एक लंबा कश लेकर धुंआ छोड़ते हुए पूछा।

''व्हिस्की और औरत।''

''तब मुझपर छोड़ दो।'' जान ने मुस्कराते हुए कहा और किसी सोच में पड़ गया।

रशीद उसको सोचों में डूबा देखकर उठ खड़ा हुआ। बाहर निकलकर वह अपनी जीप में आ बैठा और तेज़ गति से चलाता हुआ अपने आफ़िस की ओर रवाना हो गया।

उसी शाम ओबेराय पैलेस के 'बार' में गुरनाम बैठा व्हिस्की पी रहा था कि अचानक एक सुरीली आवाज़ ने उसे छेड़ दिया। यह रुख़साना थी। यौवन की बिजलियां गिराती उसके सामने वाली सीट पर बैठने की अनुमति मांग रही थी। गुरनाम ने नशीली आंखों से उस सुंदरी को देखा जो हाथों में जाम लिए उसी से सम्बोधित थी। इस सर्द रात में भी रुख़साना का लगभग आधा शरीर खुला था, जिससे हुस्न की छलकती शराब किसी को भी बहकाने के लिए पर्याप्त थी। गुरनाम थोड़ा चौकन्ना हो गया तो रुख़साना ने फिर प्रार्थना दोहराई-''मैंने कहा, हजूर...इजाज़त हो तो आपके पास बैठ जाऊं?''

''ज़रूर...ज़रूर...आप...।''

''शायद हम पहले मिल चुके हैं...यही कहना चाहते हैं न आप?''

''हां तो...।''

''कल रात आफ़िसर्स मैस में मुलाकात हुई थी।''

''ओह...हां याद आया। जान साहब कहां हैं?''

''आज नहीं आए...दो दिन के लिए बाहर गए हैं।''

''आप अकेली हैं?''

''जी नहीं...जब आप जैसे दोस्तों का साथ मिले तो मैं अपने आपको अकेली कैसे समझ सकती हूं।'' रुख़साना ने आखिरी घूंट पीते हुए अपना गिलास ख़ाली करके कहा।

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