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वापसी

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :348
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9730

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सदाबहार गुलशन नन्दा का रोमांटिक उपन्यास

रुख़साना पीर बाबा के डेरे के बाहर थोड़ी देर रकी और इधर-उधर देखकर झट अंदर प्रविष्ट हो गई। गुरनाम भी उस दरवाज़े तक आ पहुंचा। दरवाज़े पर बैठे एक आदमी ने उसे रोकना चाहा, तो गुरनाम ने झट आगे जाती हुई रुख़साना की ओर उंगली से संकेत कर दिया और लपक कर इस प्रकार रुख़साना के पीछे हो लिया, जैसे वह उसी के साथ अड्डे में आया हो।

गुरनाम जिस कमरे में रुख़साना के पीछे आया वहां तेल का एक चिराग़ जल रहा था। जिसके प्रकाश से कमरे की हर चीज़ देखी जा सकती थी। इस समय वहां कोई और व्यक्ति नहीं दिखाई दे रहा था। रुख़साना ज्यों ही कमरे की दाईं ओर गुफा में घुसी, गुरनाम भी दबे पांव उसके पीछे था। अपने पीछे कुछ आहट सुनकर पहली बार रुख़साना ने पलट कर देखा और रिवाल्वर की नाल अपनी ओर तनी पाई। रिवाल्वर के पीछे गुरनाम की मोटी लाल खूंखार आंखें देखकर वह डर से कांप गई और उसके मुंह से एक चीख़ निकलते-निकलते रह गई।

''अगर आवाज़ मुंह से निकाली तो यहीं ढेर कर दूंगा।'' गुरनाम ने दबी आवाज़ में धमकी दी। ''इस रिवाल्वर में साईलेन्सर लगा है।'' इसके साथ ही रिवाल्वर की नाल उसकी कनपटी से आ लगी।

क्षण भर घूरकर रुख़साना की ओर देखकर उसने गुर्राकर कहा-''और कौन-कौन हैं इस अड्डे में इस वक़्त?''

''कोई भी नहीं...।'' रुख़साना के मुंह से भिंची-भिंची आवाज़ निकली।

''सच-सच बता कौन है। नहीं तो देश-द्रोहियों पर दया करना मैंने नहीं सीखा।'' गुरनाम ने खूंखार स्वर में कहा और रुख़साना ने कनपटी पर रिवाल्वर की नाल का दबाव अनुभव किया। वह डर कर कह उठी-''जान है...जान है।''

''और कोई भी है?''

''नहीं...क़सम से नहीं।''

''चलो तो, जहां चलना है तुम्हें...चलती रहो।''

रुख़साना वहीं जमी खड़ी रही। गुरनाम ने रिवाल्वर की नाल उसकी कनपटी से हटाकर उसकी पीठ से लगा दी और उसे आगे धकेलता हुआ गुर्राया-''चलो...आगे बढ़ो। ज़रा भी होशियारी दिखाने की कोशिश की तो गोली अं

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