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धर्म एवं दर्शन >> प्रेममूर्ति भरत

प्रेममूर्ति भरत

रामकिंकर जी महाराज

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :349
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9822

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भरत जी के प्रेम का तात्विक विवेचन


सारा आकाश भरा हुआ था देवताओं के विमानों से। वे आये हुए थे इस अद्भुत क्रीड़ा के दर्शनार्थ। भगवान और भक्त का यह खेल बड़ा ही आनन्दवर्धक रहा। और हुआ वही जो सदा से होता आया। भक्त विजयी और भगवान पराजित! भैया भरत के जयकार से सरयूतट मुखरित हो उठा। सरयू का कल-कल निनाद भी मानो भरत की जय का ही उच्चारण कर रहा था। श्री भरत जी तो लज्जित हो रहे थे, साथ ही प्रसन्न भी। प्रभु की महती कृपा और स्नेह को देखकर और अन्तर में राघवेन्द्र की वही इच्छा जानकर!

राम-लषन इक ओर, भरत-रिपुदवन लाल इक ओर भये ।
सरजुतीर सम सुखद भूमि-थल, गनि गनि गोइयाँ बाँटि लये ।। १ ।।
कंदुक-केलि-कुसल हय चढ़ि चढ़ि, मन कसि कसि ठोंकि ठोंकि खये ।
कर-कमलनि विचित्र चौगानें, खेलन लगे खेल रिझये ।। २ ।।
व्योम बिमाननि बिबुध बिलोकत, खेलत पेखक छाँह छये ।
सहित समाज सराहि दसरथहि, बरषत निज तरु-कुसुम-वये ।। ३ ।।
एक ले बढ़त, एक फेरत, सब प्रेम-प्रमोद-बिनोद-मये ।
एक कहत भइ हारि रामजू की, एक कहत भइया भरत जये ।। ४ ।।
प्रभु बकसत गज-बाजि, बसन-मनि, जय-धुनि गगन निसान हये ।
पाइ सखा-सेवक-जाचक भरि, जनम न दुसरे द्वार गये ।। ५ ।।
नभ-पुर परति निछावरि जहँ तहँ,  सुर-सिद्धनि बरदान दये ।
भूरि-भाग अनुराग उमगि जे,  गावत-सुनत चरित नित ये ।। ६ ।।
हारे हरष होत हिय भरतहि,  जिते सकुच सिर नयन नये ।
तुलसी सुमिरि सुभाव-शील सुकृती,   तेइ जे एहि रंग रये ।। ७ ।।

धन्य है प्रभु के सौशील्य और उनकी भक्तवत्सलता को। पर एक बात और भी तो हैं, यह भक्त भी कैसा है जिसने प्रभु की इच्छा में अपने को शून्य कर डाला है- अपने को उनकी लीला का सहज उपकरण बना दिया है। पर उसे लोगों ने उस समय नहीं जाना- प्रेमामृत अव्यक्त था। प्रभु को चिन्ता हुई इस प्रेमामृत को सुलभ करने की और तब...।

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