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उपन्यास >> नास्तिक

नास्तिक

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :433
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7596

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खुद को आस्तिक समझने वाले कितने नास्तिक हैं यह इस उपन्यास में बड़े ही रोचक ढंग से दर्शाया गया है...


ज्ञानस्वरूप हाथ में पिस्तौल लिए वहाँ अब्बाजान के सिर पर खड़ा था।

सब चुपचाप नाटक का अन्त देखने के लिए कुर्सियों पर बैठ गये। सिर्फ कमला और बेयरा दरवाजे में खड़े थे। कमला ने पुलिस को कहा था, ‘‘गोली चल रही है। जल्दी आइये।’’ उसने मकान का नम्बर बता दिया था।

पाँच मिनट में ही पुलिस आ खड़ी हुई। बाहर घण्टी बजी तो खानसामा रमजान बाहर भागा और आधे मिनट में पाँच पुलिस वालों को खाने के कमरे में ले आया।

आगे-आगे सब-इंस्पेक्टर हाथ में पिस्तौल लिए हुए था। आते हुए रमज़ान ने उसको बता दिया था कि खानदान के भीतर झगड़ा हुआ है।

सब-इंस्पेक्टर ने खाने के कमरे में दाखिल होते ही कहा, ‘‘हैंड्ज़ अप।’’

ज्ञानस्वरूप ने पिस्तौल उसको देने के लिए आगे कर दिया।

‘‘टेलीफोन किसने किया था?’’ सब-इंस्पेक्टर ने पूछा।

‘‘मैंने किया था।’’ कमला ने अब भी दरवाजे के समीप खड़े हो कहा।

‘‘क्या मुआमला है?’’

‘‘ये मेरे अब्बाजान हैं और यह मेरी अम्मी हैं। ये कुछ जबर्दस्ती करना चाहते थे। जब मैं मानी नहीं तो अब्बाजान इस पिस्तौल को निकाल मुझ पर हमला करने लगे।

‘‘यह मेरे बड़े भाई हैं। इन्होंने मेरी जान बचाने के लिए अब्बाजान को बाँहों में दबोचा तो एक गोली छत को लगी है और दूसरी की आवाज मेरे टेलीफोन करते वक्त आयी थी।’’

‘‘मैं जब टेलीफोन कर लौटी थी तो अम्मी के सिर पर भी चोट आयी हुई थी और अब्बाजान को भाईसाहब बाँहों में दबोचे हुए थे।’’

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