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उपन्यास >> नास्तिक

नास्तिक

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :433
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7596

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खुद को आस्तिक समझने वाले कितने नास्तिक हैं यह इस उपन्यास में बड़े ही रोचक ढंग से दर्शाया गया है...


‘‘अगर यह और मेरी छोटी अम्मी यहाँ से अभी चले जाते हैं और आपको यकीन है कि ये फिर इस किस्म की हरकत नहीं करेंगे तो आप जाने और ये दोनों जानें। मैं इससे प्रसन्न रहूँगा।’’

पाँच सिपाहियों को एक-एक सौ रुपये और सब-इंस्पेक्टर को एक हजार रुपया देना पड़ा। सब स्टडीरूम से बाहर चले आये।

तब तक ज्ञानस्वरूप ने टेलीफोन कर टैक्सी बुला ली। खानसामा सब के लिए चाय ले आया। थानेदार इत्यादि को चाय पिला विदा करने से पहले अब्दुल हमीद और सालिहा को विदा कर दिया गया। तदनन्तर पुलिस गई।

जब सब चले गये तो सरस्वती ने पूछा, ‘‘यह हुआ क्या है? मुझे कुछ समझ नहीं आया।’’

‘‘अम्मी! समझ तो आया है मगर इसका ख्याल करने से निहायत शर्म महसूस करती हूँ।’’ कमला का कहना था।

प्रज्ञा ने इस घटना का विश्लेषण कर दिया। उसने बताया कि कोई स्मगलर अब्बाजान को राय देने वाला पैदा हो गया है। इन्होंने बताया है कि कोई अनवर अली है जिसे अब्बाजान ने अपने तस्करी के काम का मैनेजर नियुक्त किया है।

‘‘बस, यह सब उसी की योजना है। शुरु से अन्त तक बलपूर्वक हरण करने का यत्न मानो कमला तस्करी का सोना है। अब पकड़े गए हैं तो पुलिस को ले-देकर छूट गये हैं। यह उनका नित्य का खेल है।’’

‘‘और अम्मी! इसके मूल में है आसुरी स्वभाव। इस संसार में दो स्वभाव के मनुष्य मिलते हैं। दैवी, जो परमात्मा को मानते हैं और उसके बनाये तथा चलाये हुए नियमों का पालन करते हैं। दूसरे हैं असुर स्वभाव वाले। सब-कुछ अपने लिये ही करने वाला। इनके पास जब बल अथवा बल का दूसरा रूप अर्थात् धन आ जाए तो यह समझते हैं कि इनसे ऊपर संसार में कोई नहीं।’’

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