उपन्यास >> नास्तिक नास्तिकगुरुदत्त
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खुद को आस्तिक समझने वाले कितने नास्तिक हैं यह इस उपन्यास में बड़े ही रोचक ढंग से दर्शाया गया है...
रविशंकर इत्यादि को विदा कर ये ड्राइंग-रूम में आये तो अम्मियाँ अपने-अपने कमरों में, जहाँ पिछली रात वे सोई थीं, चली गईं। बच्चे बाहर बरामदे में रखी कुर्सियों पर बैठे ताश खेलने लगे। नगीना अपने कैमरे को रखने अपने कमरे में जाने लगी तो प्रज्ञा उसके साथ ही चली गई। पीछे रह गए अब्दुल हमीद और मुहम्मद यासीन।
दोनों सोफा पर बैठे तो पिता ने कह दिया, ‘‘जरा पता करो, बम्बई जाने के लिए एक ही प्लेन में दस सीटें कब मिलेंगी?’’
‘‘अब्बाजान! दस में कौन-कौन हैं?’’
‘‘तो तुम नहीं जानते? हम दस ही तो बम्बई से आए थे।’’
‘‘मगर नगीना कह रही थी कि वह नहीं जाएगी।’’
‘‘क्यों?’’
‘‘यह मैं क्या जानूँ? उसने अभी-अभी अपने कमरे को जाते हुए कहा है कि वह इस घर में ही रहना चाहती है। मुझसे पूछ रही थी कि मैं उसे रहने दूँगा या नहीं।’’
‘‘तो तुमने क्या कहा है?’’
‘‘मैंने कहा है कि वह आपसे पूछ ले। मेरी तरफ से उसे इजाजत है।’’
‘‘तो बुलाओ उसे। मैं अभी सीटें बुक कराने के लिए हवाई जहाज के दफ्तर में जाना चाहता हूँ।’’
मुहम्मद यासीन नगीना को देखने उसके कमरे में गया तो प्रज्ञा और नगीना वहाँ गम्भीर मुख बनाए बातें कर रही थीं। मुहम्मद यासीन ने प्रज्ञा से पूछा, ‘‘क्या बात है?’’
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