उपन्यास >> प्रारब्ध और पुरुषार्थ प्रारब्ध और पुरुषार्थगुरुदत्त
|
47 पाठक हैं |
प्रथम उपन्यास ‘‘स्वाधीनता के पथ पर’’ से ही ख्याति की सीढ़ियों पर जो चढ़ने लगे कि फिर रुके नहीं।
आगरे में भी शंकर देव की दुकान पर सरकारी सिपाही पहुँचे तो उनको वहाँ से पता चला कि निरंजन देव ने पिता की इच्छा के विरुद्ध एक भटियारिन की लड़की से विवाह कर लिया है और जब पिता ने उसे घर से निकल जाने की आज्ञा दी तो वह एक सप्ताह से घर से लापता है।
यह पूछे जाने पर कि वह घर से कुछ लेकर गया है, पिता ने बता दिया कि लड़के के पास एक सहस्र से ऊपर तो सोने की मुहरें हैं और भूषादि भी हैं जो वह भटियारिन की लड़की को देने के लिए ले गया था।
इससे एक भटियारिन की लड़की के अगवाह का मामला दर्ज कर जाँच बंद कर दी गई। इस पर भी मथुरा के कोतवाल ने अपनी खोज जारी रखी। मथुरा के चौकीदारों का कहना था कि लड़की मुसलमान थी वह उसके उन कपड़ों से भी सिद्ध होता था जो धर्मशाला के कमरे में पड़े मिले थे और मुसलमान कोतवाल की दृष्टि में एक मुसलमान लड़की का एक हिंदू द्वारा भगाकर ले जाना इतना बड़ा अपराध था कि उसे फाँसी तक का दंड दिया जा सकता था।
वृंदावन में उस इक्के और घोड़े का हुलिया लिख लिया गया जो निरंजन देव ने वहाँ बीस स्वर्ण मुहर में खरीदा था और खोज जारी रही।
निरंजन देव और सुंदरी अपने भय का कारण देख नगर-नगर में भटकते हुए हरिद्वार जा रहे थे। मथुरा कोतवाल के सिपाही उनका पीछा करते हुए चले जा रहे थे। सहारनपुर में उनको एक मकान में रात सोते देखा गया, परंतु प्रातःकाल जब मकान से बाहर कोई नहीं निकला तो मकान का द्वार तोड़कर भीतर घुसा गया। जाँच-पड़ताल पर पता चला कि दोनों वहाँ से भी फरार हो गए हैं। वहाँ से भी वे मकान के पीछे की खिड़की से कूदकर भागे मालूम होते थे।
|