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उपन्यास >> प्रारब्ध और पुरुषार्थ

प्रारब्ध और पुरुषार्थ

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :174
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7611

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प्रथम उपन्यास ‘‘स्वाधीनता के पथ पर’’ से ही ख्याति की सीढ़ियों पर जो चढ़ने लगे कि फिर रुके नहीं।


इस सब समय अकबर और पंडित विभूतिचरण में बातचीत होती रही। यदि आगरा का कोतवाल वहाँ के उच्च अधिकारियों को सूचित करता और वह सूचना अकबर तक पहुँचती तब शाही फरमान से पूर्ण देश में छानबीन आरंभ हो जाती। परंतु आगरा के कोतवाल ने इसे एक भटियारिन की लड़की के अगवाह की बात समझ दाखिल दफ्तर कर दिया था। मथुरा का कोतवाल तो इसलाम की रक्षा के विचार से निरंजन देव का पीछा कर रहा था। उसके मस्तिष्क में यह भूत सवार था कि एक मुसलमान औरत किसी काफिर के अधिकार में नहीं जा सकती। उसे सुन्नत करा पहले इसलाम मंजूर करना चाहिए तब ही वह मुसलमान औरत का खाविंद बन सकता है।

जिस दिन विभूतिचरण महारानी जोधाबाई के हुक्म से सराय में लाया गया और वह पूजा-पाठ तथा भोजन कर दो घड़ी आराम कर चुका तो फिर शाही सवारी आई और पंडित को महल में ले गई।

यह बात सराय के मालिक के लिए नवीन नहीं थी। जब-जब भी विभूतिचरण सराय में आकर ठहरता था, उसे ले जाने तथा छोड़ने के लिए शाही सवारी आया करती थी। विभूतिचरण को पुनः महल के अंतःपुर में जालीवाले दीवानखाने में लाकर खड़ा किया गया तो एक खादिमा उसके समीप आ झुककर सलाम कर बोली, ‘‘आप इस चौकी पर तशरीफ रखें। महारानी आधी घड़ी में आनेवाली हैं।’’

पंडित चौकी पर बैठ जाली के पीछे से आवाज आने की प्रतीक्षा करने लगा। खादिमा पंडित को वहाँ छोड़ चली गई। विभूतिचरण विचार कर रहा था कि यह जयपुर-नरेश की लड़की बहुत ही समझदार औरत है। उसने अपने पति शहंशाह के रोष को भी शांत किया होगा, तभी तो वह उसे महल के बाहर स्वतंत्र घूमने की छूट दिलवा सकी है।

इसी प्रकार के विचारों के प्रवहन से वह यह विचार करने लगा था कि क्या महारानी सुंदरी और भटियारिन के परिवार की बात पूछेगी अथवा अपने विषय में कोई प्रश्न करेगी।

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