उपन्यास >> प्रारब्ध और पुरुषार्थ प्रारब्ध और पुरुषार्थगुरुदत्त
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प्रथम उपन्यास ‘‘स्वाधीनता के पथ पर’’ से ही ख्याति की सीढ़ियों पर जो चढ़ने लगे कि फिर रुके नहीं।
विभूतिचरण को बहुत देर तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। जाली के पीछे से आवाज आई, ‘‘पंडित जी! नमस्कार करती हूँ।’’
हिंदू ढंग से एक-एक विद्वान ब्राह्मण का अभिवादन सुन विभूतिचरण के मन का रहा-सहा रोष भी मिट गया। उसने भी आशीर्वाद दे दिया, ‘‘बेगम बहन! सौभाग्यवती रहो।’’
‘‘आपको विश्वास हो गया है या नहीं कि परमात्मा के दरबार में आपकी अर्जी जा चुकी है और उस पर हुक्म सादर हो चुका है?’’
‘‘हाँ, बेगम बहन! अब मैं पूरे इत्मीनान से आपके सवालों का जवाब दे सकूँगा।’’
‘‘पहले तो आप यह बताइए कि सुंदरी भटियारिन के विषय में आप क्या जानते हैं?’’
‘‘उसके विषय में मैंने अपनी विद्या का प्रयोग किया है और जो कुछ जान पाया हूं, वह एक मुल्क की एक आलातरीन हस्ती से संबंध रखता है।’’
‘‘पंडित जी! यही तो पूछ रही हूँ कि क्या संबंध है?’’
‘‘बता सकता हूँ। परंतु उस हस्ती की इजाज़त के बिना नहीं बता सकता।’’
‘‘इस मुल्क में आलातरीन हस्ती आप किसको मानते हैं?’’
विभूतिचरण धीमी हँसी हँसता हुआ बोला, ‘‘बेगम बहन, यह मैं नहीं बताऊँगा। एक विचार से मैं अपने को किसी से कम आलातरीन नहीं मानता। मेरा मतलब ज्योतिष विद्या से है। इस प्रकार हमारे गाँव का एक जूता गाँठनेवाला अपने फन में आलातरीन है। जूते का चमड़ा घिस सकता है, मगर उसका लगाया जोड़ नहीं टूटता। इस कारण मैं यह नहीं बताऊँगा कि मेरा किस आलातरीन से मतलब है।’’
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