उपन्यास >> प्रारब्ध और पुरुषार्थ प्रारब्ध और पुरुषार्थगुरुदत्त
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प्रथम उपन्यास ‘‘स्वाधीनता के पथ पर’’ से ही ख्याति की सीढ़ियों पर जो चढ़ने लगे कि फिर रुके नहीं।
‘‘तब तो कुछ बात नहीं बनी। आपको इतना कष्ट देने का कुछ लाभ नहीं हुआ।’’
‘‘लाभ तो हो सकता है। यदि आप नाम नहीं पूछें।’’
‘‘अच्छा। नहीं पूछूँगी।’’
‘‘और जो कुछ बताऊँगा उससे अधिक नहीं पूछेंगी। मेरा मतलब है कि मेरे कहे पर प्रश्न नहीं करेंगी।’’
‘‘ठीक है। नहीं करूँगी।’’
‘‘तो सुनिए। चौदह-पंद्रह साल का एक लड़का अपने उस्ताद के साथ हिंदुस्तान में आया था। उसका वालिद एक जान जोखिम की मुहिम पर घर से बाहर था। लड़का अपने मुर्शिद के साथ घूमता हुआ गुमनाम एक ब्राह्मण के भेस में एक विद्वान ब्राह्मण के घर मेहमान बनकर ठहर गया। वहाँ उसकी संगत में ब्राह्मण की विधवा पतोहू आ गई और उसने भटियारिन की सराय में जाकर एक बच्ची प्रसव की।’’
महारानी जोधाबाई ने पूछ लिया, ‘‘यदि आज्ञा हो तो यह जानना चाहूँगी कि वह विधवा ब्राह्मणी बच्ची कहाँ है?’’
‘‘इस विषय में इतना ही जान सका हूँ कि वह भटक रही है। उसके खाविंद के संबंधी उसे एक मुसलमान की रखैल जान मुसलमान समझते हैं और आज इस मुल्क में मुसलमान हिंदू नहीं बन सकता। कम-से-कम वह अपने को ऐसा प्रकट नहीं कर सकता।’’
‘‘ऐसी बात नहीं है। कम-से-कम इस महल में तो यह नहीं है।’’
‘‘यह बात मेरी ज्योतिष विद्या से संबंध नहीं रखती। मेरे अपने देखने और अनुभव करने की बात है। यह गलत भी हो सकती है।
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