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गल्प समुच्चय (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :255
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8446

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गल्प-लेखन-कला की विशद रूप से व्याख्या करना हमारा तात्पर्य नहीं। संक्षिप्त रूप से गल्प एक कविता है


गुलमर्ग
१६ श्रावण
प्रातः ८ बजे

कमल,
नींद से उठते ही सबसे पहले मेरी निगाह रात के पत्र पर गई है। रात मैं क्या खुराफात-सी लिख गया। दिल में आता है, यह फाड़ डालूँ।

जी कुछ भारी-सा है। कुछ लिखने की भी इच्छा नहीं होती। और इस तरह निश्चेष्ट भाव से यहाँ चुपचाप पड़े रहना तो आज मुझे सह्य नहीं हो सकता। तुम जानते हो, ऊपर की दो लाइनें लिखने में कितना समय लगाया? पूरे २२ मिनट इस समय दूसरा पत्र लिख सकना मेरे लिए असंभव है। चलो अब कहीं आवारा गर्दी करने जाऊँगा।

सायंकाल ६।। बजे।

मेरा जी इस समय बहुत प्रसन्न है। मेरी टाँगे, मेरा सम्पूर्ण शरीर बिलकुल थकी हुई हालत में है; परन्तु जी चाहता है कि इस समय भी नाचूँ, कूदूँ और इधर-उधर दौड़ता फिरूँ मेरे हृदय में इस समय उत्साह का जो अन्धड़-सा चल रहा, मुझे मालूम है कि उसकी प्रतिक्रिया भी जरूर होगी। अपने जी के इस व्यर्थ उत्साह को बहकाने का मुझे इससे बढ़कर अधिक अच्छा उपाय नहीं मिला कि सुबह का पत्र पूरा करने बैठ जाऊँ।

साँझ हो आई। आज का सारा दिन मैंने सैर-सपाटे में काटा है। थोड़ी देर पहले घर वापस आया हूँ तुम्हारी चिट्ठी बीच में छोड़कर मैं एक मजबूत घोड़े पर सैर के लिए निकल गया था। यहाँ के सभी मार्ग मेरे जाने पहचाने हैं। इसमें कोई मार्ग दर्शक भी मैंने साथ नहीं लिया मेरे निवास स्थान से करीब ८ मील की दूरी पर एक बड़ा पहाड़ी झरना है इस झरने को यहाँ ‘निंगली नाला’ कहते हैं। मैं आज इसी निंगली नाले तक गया था।

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