कहानी संग्रह >> गल्प समुच्चय (कहानी-संग्रह) गल्प समुच्चय (कहानी-संग्रह)प्रेमचन्द
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गल्प-लेखन-कला की विशद रूप से व्याख्या करना हमारा तात्पर्य नहीं। संक्षिप्त रूप से गल्प एक कविता है
खूब टेढ़ी–मेंढी राह है! कहीं पहाड़ों के चक्कर हैं, कहीं घास के बड़े मैदान, कहीं ऊँचाई-नीचाई, कहीं पेंचदार मोड़ और कहीं घने जंगल। रास्ता क्या है ऊबड़-खाबड़-सी एक-एक पगडंडी है। इस रास्ते पर मैंने अपनी घोड़ा खूब निश्चिन्तता के साथ दौड़ाया। ऊपर असंख्य पक्षियों का मधुर कलरव था। राह के दोनों ओर फूल पत्तियाँ थीं, आसमान में सूरज बादलों के साथ आँखमिचौनी खेल रहा था। कभी सरदी बढ़ रही थी और कभी हल्की-हल्की घाम निकल आती थी। शीघ्र ही मैं निंगली नाले पर पहुँचा। झरने के दोनों ओर घना जंगल है। बीच में बड़ी-बड़ी चट्टानें पड़ी हैं। एक–एक चट्टान सैकड़ों-हजारों टन की होगी। झरने का स्वच्छ जल इन भीमकाय चट्टानों से टकराकर शोर मचाता है, फिसलता है और फिर उछल-उछलकर उन्हें गीला करता है। झरने की शीतलता, भाग, सफेदी और शोर-ये सब निरन्तर बने रहते हैं। सदा ताजे, उत्साहपूर्ण।
घोड़े को घास चरने के लिए खुला छोड़कर मैं दो तीन घण्टे तक झरने की चट्टानों पर स्वच्छन्दतापूर्वक कूदता-फांदता रहा अपने कैमरे से इन झरने के मैंने अनेक फोटो भी लिए। खाया-पिया और उसके बाद वापस लौट चला।
वापसी में मैंने अपने घोड़े को सरपट नहीं दौड़ाया। राह के दृश्यों ने मेरा सम्पूर्ण ध्यान अपनी ओर खींच लिया था, अतः घोड़े पर मैंने किसी तरह का शासन नहीं किया। वह आजादी के साथ चाहे जिस चाल चलता रहा सहसा सामने की ओर से मुझे एक चीख सी सुनाई पड़ी मेरी तन्मयता भंग हो गई। मैंने देखा, सामने के मैदान में एक घोड़ा बेतहाशा दौड़े आ रहा है, और उस पर एक स्त्री सवार है घोड़े की जीन को लेटी-सी दशा में कसकर पकड़े हुए नारी सहायता के लिए भरकस चिल्ला रही थी। उसी निगाह में मुझे यह भी दिखाई दिया कि पगडंडी पर तीन-चार अन्य घुड़सवार भी मौजूद हैं। सब-की-सब लड़कियाँ ही। वे सब असमर्थों का-सा भाव धारण किये अपने काश्मीरी कुलियों को वह घोड़ा पकड़ने का आदेश दे रही थीं।
एक ही क्षण में मैंने अपना घोड़ा उसी ओर दौड़ा दिया शीघ्र ही उस स्त्री-सवार के निकट जा पहुँचा अपने घोड़े से कूदकर मैंने उस घोड़े की लगाम पकड़ ली।
फिर वही आँखें!
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