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गल्प समुच्चय (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :255
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8446

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गल्प-लेखन-कला की विशद रूप से व्याख्या करना हमारा तात्पर्य नहीं। संक्षिप्त रूप से गल्प एक कविता है


मैं सहसा घबरा-सा गया। मुझे यह भी नहीं सूझा कि मैं क्या कहकर उस कन्या को आश्वासन दूँ। मगर मेरी घबराहट की ओर उसका ध्यान नहीं गया वह स्वयं ही बहुत अधिक संकटापन्न दशा में जो थी।

पहले उसी ने मुझे धन्यवाद दिया। मालूम होता है, उसने मुझे पहचाना नहीं धन्यवाद देकर उसने शीघ्रता से कहा– बड़ा नटखट घोड़ा है। मैं पहले ही कह रही थी कि मैं इस पर सवार न होऊँगी।

उसकी आवाज में अभी तक एक कँपकपी थी। मैंने कहा– आपने बड़ी हिम्मत दिखाई घोड़े की चाल इतनी तेज हो जाने पर भी आप गिरी नहीं।

वह इस पर लजा-सी गई। उसने कहा– मैं घुड़सवारी तो क्या जानूँ। सुना था इधर के घोड़े बड़े सीधे होते हैं।

इसी समय उसके साथ की अन्य सभी लड़कियाँ और घोड़ेवाले कुली भी वहाँ आ पहुँचे। घोड़े की लगाम अभी तक मेरे हाथों में थी, और वह लड़की भी अभी तक घोड़े की पीठ पर ही थी। एक काश्मीरी ने लगाम अपने हाथों में थाम ली और दूसरे ने जीन को सँभाला; वह लड़की नीचे उतर आई। उसके साथ की सभी लड़कियों ने मुझे धन्यवाद दिया। और मैंने कहा इसमें धन्यवाद की क्या बात है।

उन्होंने मुझसे पूछा आप-किस जगह ठहरे हुए हैं?

मैंने अपना पता बता दिया।

मेरे निवास-स्थान का पता सुनकर जैसे उस लड़की ने मुझे पहचान लिया। उसके मुँह से हठात् निकला-‘ओहो।’ परन्तु उसी क्षण अपने को पूर्णतः संयत करके उसने बड़ी शान्ति से कहा मैं समझ गई।

इसके बाद दो-चार मामूली-सी बातें भी हुईं, और तब वे लोग निंगली नाले की ओर बढ़ गये। जाते हुए वे कल प्रातः चाय के लिए निमन्त्रित भी करते गये।

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