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गल्प समुच्चय (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :255
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8446

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गल्प-लेखन-कला की विशद रूप से व्याख्या करना हमारा तात्पर्य नहीं। संक्षिप्त रूप से गल्प एक कविता है


उस नटखट घोड़े की रास जब एक कश्मीरी के हाथ में थी वे सब घोड़े अब बहुत धीमी चाल से जा रहे थे, वह घोड़ा सब के पीछे कर दिया गया था मेरी नजर अभी तक उसी ओर थी कि कुछ ही दूर जाकर उस लड़की ने पीछे की ओर मुड़कर देखा।

अचानक एक बार पुनः मेरी और उसकी नजर मिल गई।

ओह,फिर वही निष्पाप, लज्जाभरी स्वच्छ आँखें!

भाई कमल मुझे नहीं मालूम कि वे लड़कियाँ कौन हैं। नवयुवतियाँ हैं मेरा अनुमान है कि उनमें से अभी तक किसी का विवाह नहीं हुआ। मैं उनमें से किसी का नाम भी नहीं जानता, मकान का पता देने के लिए एक पुरुष का नाम ही उन्होंने मुझे बताया है। यह भी नहीं जानता कि वे आपस में बहनें हैं, या सहेलियाँ हैं, एक साथ पढ़ने वाली हैं या रिश्तेदार हैं। मुझे कुछ भी नहीं मालूम। परन्तु एक बात मैंने अच्छी तरह देख ली। वह यह कि उस लड़की के गेंहुएँ चेहरे में असाधारणता जरा भी नहीं है। उसकी आँखों में उसकी पलकों या भौंहों में ऐसी कोई बात नहीं है, जिसके सम्बन्ध में कवि लोग बड़ी-बड़ी उपमाएं खोज-खोज कर दिया करते हैं। फिर भी उसकी निगाह में कुछ है। क्या है-यह मैं नहीं कह सकता; मगर कुछ है जरूर।

बाहर अँधेरा हो गया है। सरदी भी अब अनुभव होने लगी है, अतः प्रणाम।
अभिन्न
स.

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