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गल्प समुच्चय (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :255
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8446

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गल्प-लेखन-कला की विशद रूप से व्याख्या करना हमारा तात्पर्य नहीं। संक्षिप्त रूप से गल्प एक कविता है


गुलमर्ग
१७ श्रावण...

प्यारे कमल,
आज जाकर मुझे तुम्हारा पहला पत्र मिला है। तुम सच मानो, गुलमर्ग के छोटे से बाजार में साइनबोर्डों के अतिरिक्त यही एक पहली चीज है, जिसे मैंने पाँच-छः दिनों में पढ़ा है।

मेरा आज का दिन भी बड़े आनन्द से गुजरा है। सुबह-सुबह मैं उन लोगों के यहाँ चाय पीने गया था। उसके बाद हम लोग एक साथ खिलनमर्ग की सैर के लिए निकल गये। यहाँ घण्टों तक उस मैदान में बैठकर ताश खेला किये। सैर की, खेले-कूदे और फिर वापस लौट आये। सब लोग मेरे निवास-स्थान पर आये। शाम की चाय यहाँ ही हुई, और अभी-अभी मैं उन्हें उनके घर तक छोड़ कर आ रहा हूँ।

मुझे उनका परिचय भी मिल गया है। वह लड़की अपने भाई और एक चचेरी बहन के साथ काफी दिन हुए यहाँ आई थी। उसके पिता एक सम्पन्न व्यापारी हैं, उनका कारोबार खूब चलता हुआ है। वह लड़की लाहौर के एक महिला कालेज में पढ़ती है। और बाकी तीनों लड़कियाँ उसके क्लास की हैं, उसकी मित्र हैं और उसी के निमंत्रण पर यहाँ आई हैं। उनके भाई का स्वभाव भी बड़ा मधुर है। गुलमार्ग में उनके दोस्तों की इतनी अधिकता है कि उनकी ओर से छुटकारा पा सकना ही उसके लिए कठिन हो जाता है। हम लोग आपस में खूब हिल-मिल गये हैं। मैंने उन लोगों के अनेक फोटो भी लिए हैं।

आज जल्दी ही सो जाने को जी चाहता है। तुम्हारा पत्र इस समय मेरी आँखों के सामने नहीं है। कुछ याद नहीं आ रहा कि तुमने उसमें कोई बात पूछी भी या नहीं? चलो, जाने दो। यह तो मुझे मालूम ही है कि तुम खास काम की बात तो पूछ नहीं सकते।

यह भी नामुमकिन नहीं है कि मैं यहाँ कुछ दिन और ठहर जाऊँ।
स्नेही
स.

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