कहानी संग्रह >> गल्प समुच्चय (कहानी-संग्रह) गल्प समुच्चय (कहानी-संग्रह)प्रेमचन्द
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गल्प-लेखन-कला की विशद रूप से व्याख्या करना हमारा तात्पर्य नहीं। संक्षिप्त रूप से गल्प एक कविता है
गुलमर्ग
१८श्रावण...
कमल,
साँझ डूबने की है। दिन भर से आसमान में बादल छाये हुए थे। इस समय मूसलाधार वर्षा हो रही है। मेरे कमरे की सभी खिड़कियाँ बन्द हैं। कमरे में बत्ती जल रही है। मेरे कानों में संगीत गूँज रहा-बहुत करुण, बहुत पवित्र और बहुत ही मधुर। इस संगीत में शब्द नहीं केवल स्वर हैं। स्वर भी क्या, केवल गूँज है। छत की टीन पर वर्षा पड़ने की जो यकसाँ आवाज हो रही है, वह इस गूँजमय शरीर का साज है और ठण्डी, गीली हवा की धू-धू इस संगीत की तान का काम कर रही है।
मैं अकेला हूँ। दिन-भर अकेला नहीं था; परन्तु इस समय फिर से अकेला ही हूँ। वह अपने भाई और छोटी बहन को लेकर यहाँ आई थी। तीन बजे के करीब उसके भाई चाय के एक निमंत्रण पर बाहर चले गये। वह और उसकी बहन यहाँ ही रह गईं कल वाले फोटोग्राफ धुलकर आ गये थे। उन फोटोज की आलोचना-प्रत्यालोचना होती रही। और भी बीसियों तरह की बातें हुईं। शाम को अँधेरा जब बढ़ने लगा, तो मैंने उससे अनुरोध किया कि वह कोई गाना सुनाये। बड़ी झिझक के बाद उसने एक गाना सुनाया। ओह, वह कितना मधुर गाती है। मैं किसी दूसरे लोक में जा पहुँचा। मुझे नहीं मालूम की संगीत कब समाप्त हुआ। हाँ उसके भाई साहब का आना मुझे जरूर याद है। देर हो गई थी।, अतः वे लोग लौटने को हुए मैंने उन लोगों को सहन के फाटक से ही विदा दे दी, उन्हें छोड़ने के लिए दूर तक केवल इसलिए साथ नहीं गया, क्योंकि मुझे ज्ञात था उनके भाई साहब चुपचाप चलना पसन्द नहीं करेंगे और इस समय मैं न कुछ सुनना चाहता था, न बोलना चाहता था।
उन्हें गये थोड़ी ही देर हुई थी। जोर की वर्षा शुरू हो गई। तब से इसी कमरे में बैठा हूँ। संगीत कभी का थम गया, गानेवाली भी चली गई; मगर उसकी गूँज अभी तक बाकी है। संगीत की यह अनिर्वचनीय, अमूर्त गूँज वर्षा की आवाज का प्राकृतिक साज पाकर मानो और भी अधिक मेदिनी बन गई है।
कमल, तुम सुख-दुख के साथी हो। अपनी सभी अनुभूतियाँ तुमसे कहकर मैं अपने चित्त का बोझ हल्का करता हूँ,; मगर यह एक अनुभूति कुछ ऐसी है कि इसे ठीक तौर से व्यक्त नहीं किया जा सकता। मेरे जी में आँधी सी चल रही है; मगर यह आँधी बिलकुल शब्द रहित है। जैसे नदी का वेगवान पानी अन्दर-ही-अन्दर से किनारे के कछारों को काट रहा हो।
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