कहानी संग्रह >> गल्प समुच्चय (कहानी-संग्रह) गल्प समुच्चय (कहानी-संग्रह)प्रेमचन्द
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गल्प-लेखन-कला की विशद रूप से व्याख्या करना हमारा तात्पर्य नहीं। संक्षिप्त रूप से गल्प एक कविता है
अपनी एक पुरानी धुँधली-सी अनुभूति मुझे इस समय साफ तौर से समझ में आ रही है। हम मनुष्यों के बाह्य-जीवन आपस में एक दूसरे पर इतने अधिक आश्रित हो गये हैं कि हम लोगों के लिए इस तरह का एक दिन भी काटना संभव नहीं रहा, जब कि एक मनुष्य का किसी भी दूसरे मनुष्य से किसी तरह का वास्ता न पड़े। इस पर भी मैं सदैव अनुभव करता रहा हूँ कि हम लोग आपस में एक दूसरे से बहुत अधिक दूर हैं। हृदयों का यह पारस्परिक अपरिचितपन हमारे से बहुत दैनिक सामान्य जीवन में कोई बाधा नहीं डालता फिर भी हमारे जी को; हमारे अन्तःकरण को और शायद हमारी अन्तरात्मा को भी यह चाह रहता है कि वह किसी दूसरे अन्तःकरण को अपना ले। यही चीज, अन्तरात्मा की यही चाह प्रेम है, जिसे वासना का परिधान पहना कर हम लोग बहुत शीघ्र मैला कर डालते हैं। आज इस संगीतमय, ठंडे, शान्त और सुन्दरतम वातावरण में मैं यह अनुभव करने लगा हूँ कि मेरे अन्तःकरण में भी इसी तरह की कोई बेचैनी सहसा उठ खड़ी हुई। आज उससे मेरी खूब बात हुई। अधिकांश बातें बिल्कुल बेमतलब की थीं; मगर फिर भी वे बातें अत्यन्त मधुर, दिल को सहलाने वाली थीं।
एक बात ऐसी भी हुई, जिसने मेरे हृदय को वेग के साथ झनझना दिया। बातचीत में उसने जरा हैरानी के साथ मुझसे पूछा-आप अकेले ही रहते हैं?
मैंने कहा–हाँ।
उसने पूछा-हमेशा इसी तरह रहते हैं?
मैंने कहा–प्रायः हमेशा ही।
कुछ क्षण के बाद उसने मुझसे पूछा-सुबह आपको दूध पिलाने का काम किसके हाथों में है?
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