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गल्प समुच्चय (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :255
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8446

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गल्प-लेखन-कला की विशद रूप से व्याख्या करना हमारा तात्पर्य नहीं। संक्षिप्त रूप से गल्प एक कविता है


मुझे उसका भोला-सा सवाल बहुत ही मधुर जान पड़ा। मैंने कहा– जो लोग मेरी जरूरत का और सब इन्तजाम करते हैं, वही दूध का भी इन्तजाम करते हैं।

उसने फिर सुबह खाते क्या हैं?

मैंने कहा– दूध, टोस्ट, मक्खन, ओवलटीन और थोड़े से मेवे।

यों ही बिल्कुल निष्कलंक भाव से उसने जरा आग्रह के-से स्वर में कहा– अगर मैं आपके दूध का इन्तजाम करने वाली होती, तो आपको पता चलता कि सुबह के कलेवे में कितना स्वाद है।

मेरा सम्पूर्ण अन्तः करण झनझना उठा। अपने चेहरे पर हल्की-सी और फीकी मुस्कराहट ले आने के अतिरिक्त मैं उसकी इस अत्यन्त मधुर बात का कोई जवाब नहीं दे सका।

मुझे मालूम है कि उसने जो कुछ कहा था, इसका कोई गहरा अभिप्राय कदापि नहीं था। सम्भवतः घर के लोगों को सुबह-दूध पिलाने का इन्तजाम उसी के जिम्मे होगा; फिर भी मेरे दिमाग ने उसकी इस बात को इतनी गहराई के साथ हृदय के पास पहुँचाया कि मेरा सम्पूर्ण अन्तःकरण बहुत मीठे स्वरों में ध्वनित हो उठा।

हाथ ठिठुर रहे हैं। मेरी यह चिट्ठी पढ़कर तुम कहीं ऊबने तो नहीं लगे? ठीक है न? या अभी कुछ और सुनने की इच्छा है?
तुम्हारा–
स.

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