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गल्प समुच्चय (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :255
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8446

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गल्प-लेखन-कला की विशद रूप से व्याख्या करना हमारा तात्पर्य नहीं। संक्षिप्त रूप से गल्प एक कविता है


देखो न भाई कमल, बात यह है कि पश्चिम की शिक्षा ने पश्चिम के रीति-रिवाजों ने, हमें यह सिखाया है कि हमें अपने दिल को, अपने अन्तःकरण को मीठी-मीठी बातें करें, उनसे फायदा उठायें, इच्छा हो और सम्भव हो, तो उनसे सभी तरह के विनोद और आमोद भी प्राप्त करें; परन्तु अपना अन्तःकरण अपना दिल अपने पास रखें; क्योंकि वह हमारी चीज है; और किसी की भी नहीं। अपने दिल को बिल्कुल निस्संग बनाने की भी आवश्यकता नहीं है; वह तो आत्म-विनोद का सर्वश्रेष्ठ साधन है। तुम सच से मिलो-जुलो; हँसकर खुलकर; मीठी-मीठी बातें करो; मगर किसी के बन मत जाओ; अपना व्यक्तित्व जुदा रखो।

मैंने यह अनुभव किया है; कमल; कि मेरे हृदय में अभी भावुकता बाकी है; वह भी काफी मात्रा में। मेरा हृदय मोह में पड़ गया है। पूरब के अशिक्षित आदमियों के समान वह चाहता है कि वह जिसकी ओर झुका है; उसी का बनकर रहे; मगर मेरे दिमाग की शिक्षा ने मेरे जी को आदेश दिया है कि वह अपने को इस कठिन परीक्षा में न डाले। देखूँ मेरा दिल कहां तक दिमाग की बात मान सकता है। देखूँ; गुलमर्ग को भुला सकता हूँ या नहीं। अब तो आ ही रहा हूँ। बेफ्रिक रहो। तुम्हारे लिए काफी फल अपने साथ लाऊँगा!

अभिन्न
स.

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