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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
हरिसेवक–नहीं नोरा, तुमने कभी शिकायत नहीं की और न करोगी; लेकिन मैंने तुम्हारे साथ जो घोर अत्याचार किया है, उसकी व्यथा से आज मेरा अन्तःकारण पीड़ित हो रहा है। मैंने तुम्हें अपनी तृष्णा की भेंट चढ़ा दिया, तुम्हारे जीवन का सर्वनाथ कर दिया। ईश्वर! तुम मुझे इसका कठिन-से-कठिन दंड देना! लौंगी ने कितना विरोध किया; लेकिन मैंने एक न सुनी। तुम निर्धन होकर सुखी रहतीं। मुझे तृष्णा ने अन्धा बना दिया था। फिर जी डूबा जाता है! शायद उस देवी के दर्शन न होंगे। तुम उससे कह देना नोरा, कि यह स्वार्थी, नीच, पापी जीव अन्त समय तक उसकी याद में तड़पता रहा...
मनोरमा ने रोकर कहा–दादाजी, आप ऐसी बातें क्यों करते हैं? लौंगी अम्माँ कल शाम तक आ जाएँगी।
हरिसेवक हँसे, वह विलक्षण हँसी, जिसमें समस्त जीवन की आशाओं और अभिलाषाओं का प्रतिवाद होता है। फिर सन्दिग्ध भाव से बोले–कल शाम तक? हाँ, शायद।
मनोरमा आँसुओं के वेग को रोके हुए थी। उसे उस चिर परिचित स्थान में आज एक विचित्र शंका का आभास हो रहा था। ऐसा जान पड़ता था कि सूर्य-प्रकाश कुछ क्षीण हो गया है, मानों संध्या हो गई है। दीवान साहब के मुख की ओर ताकने की हिम्मत न पड़ती थी।
दीवान साहब छत की ओर टकटकी लगाए हुए थे, मानों उनकी दृष्टि अनंत के उस पार पहुँच जाना चाहती हो। सहसा उन्होंने क्षीण स्वर से पुकारा–नोरा!
मनोरमा ने उनकी ओर करूण नेत्रों से देखकर कहा–खड़ी हूँ, दादाजी!
दीवान–ज़रा कलम दावात लेकर मेरे समीप आ जाओ। कोई और तो यहाँ नहीं है? मेरा दान-पत्र लिख लो। गुरुसेवक की लौंगी से न पटेगी। मेरे पीछे उसे बहुत कष्ट होगा। मैं अपनी सब जायदाद लौंगी को देता हूँ। जायदाद के लोभ से गुरुसेवक उससे दबेगा। तुम यह लिख लो और तुम्हीं इसकी साक्षी देना। ज़रा बहू को बुला लो, मैं उसे भी समझा दूँ। यह वसीयत तुम अपने ही पास रखना। ज़रूरत पड़ने पर इससे काम लेना।
मनोरमा अन्दर जाकर रोने लगी। आँसुओं का वेग उसके रोके न रुका! उसकी भाभी ने पूछा–क्या है दीदी, दादाजी का जी कैसा है?
यह कहते हुए वह घबराई हुई दीवान साहब के सामने आकर खड़ी हो गई। उसकी आँखों में आँसू भर आये। कमरे में वह निस्तब्धता छायी हुई थी, जिसका आशय सहज ही समझ में आ जाता है। उसने दीवान साहब के पैरों पर सिर रख दिया और रोने लगी।
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