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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
दीवान साहब ने उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हुए कहा–बेटी? यह मेरा अन्तिम समय है। यात्रा के सामान कर रहा हूँ! गुरुसेवक के आने तक क्या होगा, नहीं जानता। मेरे पीछे लौंगी बहुत दिन तक न रहेगी। उसका दिल न दुखाना। मेरी तुमसे यही याचना है। तुम बड़े घर की बेटी हो। जो कुछ करना, उसकी सलाह से करना। इसी में वह प्रसन्न रहेगी। ईश्वर तुम्हारा सौभाग्य अमर करें!
यह कहते-कहते दीवान साहब की आँखें बन्द हो गईं। कोई आध घण्टे के बाद उन्होंने आँखें खोलीं और उत्सुक नेत्रों से इधर-उधर देखकर बोले–अभी नहीं आयी? अब भेंट न होगी।
मनोरमा ने रोते हुए कहा–दादाजी, मुझे भी कुछ कहते जाइए। मैं क्या करूँ? दीवान साहब ने आँखें बन्द किए हुए कहा–लौंगी को देखो!
थोड़ी देर में राजा साहब आ पहुँचे। अहिल्या भी उनके साथ थी। मुंशी वज्रधर को भी उड़ती हुई खबर मिली। दौड़े आए। रियासत सैकड़ों कर्मचारी ज़मा हो गए। डाक्टर भी आ पहुँचा। किन्तु दीवान साहब ने आँखें न खोलीं।
संध्या हो गई थी। कमरे में सन्नाटा छाया हुआ था। सब लोग सिर झुकाए बैठे थे, मानों श्मशान में भूतगण बैठें हों। सबको आश्चर्य हो रहा था कि इतनी जल्द यह क्या हो गया। अभी कल शाम तक तो मजे में रियासत का काम करते रहे। दीवान साहब अचेत पड़े हुए थे, किन्तु आँखों से आँसू की धारें बह-बहकर गालों पर आ रही थीं। उस वेदना का कौन अनुमान कर सकता है!
एकाएक द्वार पर एक बग्धी आकर रुकी और उसमें से एक स्त्री उतरकर घर में दाखिल हुई। शोर मच गया–आ गई, आ गई। यह लौंगी थी।
लौंगी आज ही हरिद्वार से चली थी। गुरुसेवक से उसकी भेंट न हुई थी। इतने आदमियों को जमा देखकर उसका हृदय दहल उठा। उसके कमरे में आते ही और लोग हट गए। केवल मनोरमा, उसकी भाभी और अहिल्या रह गई।
लौंगी ने दीवान साहब के सिर पर हाथ रखकर भर्रायी हुई आवाज़ में कहा–प्राणनाथ! क्या मुझे छोड़कर चले जाओगे?
दीवान साहब की आँखें खुल गईं। उन आँखों में कितनी अपार वेदना थी, किन्तु कितना अपार प्रेम!
उन्होंने दोनों हाथ फैलाकर कहा–लौंगी, और पहले क्यों न आयी?
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