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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


एक दिन मनोरमा के साथ शंखधर भी लौंगी के पास गया। लौंगी बड़ी देर तक अपनी तीर्थ-यात्रा की चर्चा करती रही। शंखधर उसकी बातें गौर से सुनने के बाद बोला–क्यों दाई, तुम्हें तो साधु-संन्यासी बहुत मिले होंगे?

लौंगी ने कहा–हाँ बेटा, मिले क्यों नहीं। एक संन्यासी तो ऐसा मिला था कि हू-बहू तुम्हारे बाबूजी से सूरत मिलती थी। बदले हुए भेस में ठीक तो न पहचान सकी, लेकिन मुझे ऐसा मालूम होता था कि वही हैं।

शंखधर ने बड़ी उत्सुकता से पूछा–जटा बड़ी-बड़ी थीं?

लौंगी–नहीं, जटा-सटा तो नहीं थी, वस्त्र ही गेरुआ रंग के थे। हाँ, कमंडल अवश्य लिये हुए थे। जितने दिन मैं जगन्नाथपुरी में रही, वह एक बार रोज़ मेरे पास आकर पूछ जाते, क्यों माताजी, आपको किसी बात का कष्ट तो नहीं है? और यात्रियों से भी वह यही बात पूछते थे। जिस धर्मशाला में मैं टिकी थी उसी में एक दिन एक यात्री को हैजा हो गया। संन्यासीजी उसे उठवाकर अस्पताल ले गये और दवा करायी। तीसरे दिन मैंने उस यात्री को फिर देखा। वह घर लौटता था। मालूम होता था, संन्यासीजी अमीर हैं। दरिद्र यात्रियों को भोजन करा देते और जिनके पास किराए के रुपये न होते; उन्हें रुपये भी देते थे। वहाँ तो लोग कहते थे कि यह कोई बड़े राजा संन्यासी हो गए हैं! नोरा, तुमसे क्या कहूँ, सूरत बिलकुल बाबूजी से मिलती थी। मैंने नाम पूछा, तो सेवानन्द बताया। घर पूछा, तो मुस्कुराकर बोले–सेवानगर। एक दिन मैं तो मरते-मरते बची। सेवानन्द न पहुँच जाते, तो मर ही गई थी। एक दिन मैंने उनको नेवता दिया। जब वह खाने बैठे तो मैंने यहाँ का जिक्र छेड़ दिया। मैं देखना चाहती थी कि इन बातों से उनके दिल पर क्या असर होता है, मगर उन्होंने कुछ भी न पूछा। मालूम होता था, मेरी बातें उन्हें अच्छी नहीं लग रही थीं। आखिर मैं चुप रही। उस दिन से वह फिर न दिखाई दिए। जब लोगों से पूछा, तो मालूम हुआ कि रामेश्वरी चले गये। एक जगह जमकर नहीं रहते, इधर-उधर विचरते ही रहते हैं। क्यों नोरा, बाबूजी होते तो जगदीशपुर का नाम सुनकर कुछ तो कहते?

मनोरमा ने तो कुछ उत्तर न दिया, न जाने क्या सोचने लगी थी, पर शंकधर बोला–दाई, तुमने यहाँ तार क्यों न दे दिया? हम लोग फौरन पहुँच जाते।

लौंगी–अरे, तो कोई बात भी तो हो बेटा, न जाने कौन था, कौन नहीं था। बिना जाने-बूझे क्यों तार देती?

मनोरमा ने गम्भीर भाव से कहा–मान लो वही होते, तो क्या तुम समझते हो कि वह हमारे साथ आते। कभी नहीं। आना होता, तो जाते ही क्यों?

शंखधर–किस बात पर नाराज होकर चले गये थे, अम्माँ? कोई-न-कोई बात ज़रूर हुई होगी? अम्माँजी से पूछता हूँ, तो रोने लगती हैं, तुमसे पूछता हूँ। तो तुम बताती ही नहीं।

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