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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
मनोरमा–मैं किसी के मन की बात क्या जानूँ? किसी से कुछ कहा–सुना थोड़े ही।
शंखधर–मैं यदि उन्हें एक बार देख पाऊँ, तो फिर कभी साथ ही न छोड़ूँ। क्यों दाई, आजकल वह संन्यासीजी कहाँ होंगे?
मनोरमा–अब दाई यह क्या जाने? सन्यासी कहीं एक जगह रहते हैं, जो वह बता दे।
शंखधर–अच्छा दाई, तुम्हारे ख़याल में संन्यासी जी की उम्र क्या रही होगी?
लौंगी–मैं समझती हूँ, उनकी उम्र कोई ४० वर्ष की होगी।
शंखधर ने कुछ हिसाब करके कहा–रानी अम्माँ, यही तो बाबूजी की भी उम्र होगी।
मनोरमा ने बनावटी क्रोध से कहा–हाँ, हाँ, वही संन्यासी तुम्हारे बाबूजी हैं। बस अब माना। अभी उम्र ४० वर्ष की कैसे हो जाएगी?
शंखधर समझ गया कि मनोरमा को यह जिक्र बुरा लगता है। इस विषय में फिर से मुँह से एक शब्द न निकाला; लेकिन वहाँ रहना अब उसके लिए असम्भव था। रामेश्वर का हाल तो उसने भूगोल में पढ़ा था; लेकिन अब उस अल्पज्ञान से उसे संतोष न हो सकता था। वह जानना चाहता था कि रामेश्वर को कौन रेल जाती है, वहाँ लोग जाकर ठहरते कहाँ हैं? घर के पुस्तकालय में शायद कोई ऐसा ग्रंथ मिल जाए, यह सोचकर वह बाहर आया और शोफ़र से बोला–मुझे घर पहुँचा दो।
शोफ़र–महारानीजी न चलेंगी?
शंखधर–मुझे ज़रूरी काम है, तुम पहुँचाकर लौट आना। रानी अम्माँ से कह देना, वह चले गये।
वह घर आकर पुस्तकालय में जा रहा था कि गुरुसेवक सिंह मिल गए। आज कल यह महाशय दीवानी के पद के लिए ज़ोर लगा रहे थे। हर एक काम बड़ी मुस्तैदी से करते; पर मालूम नहीं, राजा साहब क्यों उन्हें स्वीकार न करते थे। मनोरमा कह चुकी थी, अहिल्या ने भी सिफ़ारिश की पर राजा साहब अभी तक टालते जाते थे। शंखधर उन्हें देखते ही बोला–गुरुजी, ज़रा कृपा करके मुझे पुस्तकालय से कोई ऐसी पुस्तक निकाल दीजिए, जिसमें तीर्थस्थानों का पूरा-पूरा हाल लिखा हो।
गुरुसेवक ने कहा–ऐसी तो कोई किताब पुस्तकालय में नहीं है।
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