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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


शंखधर–अच्छा, तो मेरे लिए कोई ऐसी किताब मँगवा दीजिए।

यह कहकर वह लौटा ही था कि कुछ सोचकर बाहर चला गया और एक मोटर को तैयार करा के शहर चला। अभी उसका तेरहवाँ ही साल था; लेकिन चरित्र में इतनी दृढ़ता थी कि जो बात मन में ठान लेता, उसे पूरा ही करके छोड़ता। शहर जाकर उसने अँगरेज़ी पुस्तकों की कई दुकानों से तीर्थ-यात्रा-सम्बन्धी पुस्तकें देखीं और किताबों का एक बंडल लेकर घर आया।

राजा साहब भोजन करने बैठे, शंखधर वहाँ न था। अहिल्या ने जाकर देखा, तो वह अपने कमरे में बैठा कोई किताब देख रहा था।

अहिल्या ने कहा–चलकर खाना खा लो, दादाजी बुला रहे हैं।

शंखधर–अम्माँजी, आज मुझे बिलकुल भूख नहीं है।

अहिल्या–कोई नई किताब लाये हो क्या? अभी भूख क्यों नहीं है? कौन-सी किताब है?

शंखधर–नहीं अम्माँजी, मुझे भूख नहीं लगी।

अहिल्या ने उसके सामने से खुली हुई किताब उठा ली और दो-चार पंक्तियाँ पढ़-कर बोली–इसमें तो तीर्थों का हाल लिखा हुआ है–जगन्नाथ, बदरीनाथ, काशी और रामेश्वर। यह किताब कहाँ से लाये?

शंखधर–आज ही तो बाज़ार से लाया हूँ। दाई कहती थी। कि बाबूजी की सूरत का एक संन्यासी उन्हें जगन्नाथ पुरी में मिला था, और वह वहाँ से रामेश्वर चला गया।

अहिल्या ने शंखधर को दया–सजल नेत्रों से देखा; पर उसके मुख से कोई बात न निकली। आह! मेरे लाल! तुझमें इतनी पितृ-भक्ति क्यों है? तू पिता के वियोग में क्यों इतना पागल हो गया है? तुझे तो पिता की सूरत भी याद नहीं। तुझे तो इतना भी याद नहीं कि कब पिता की गोद में बैठा था, कब उनकी प्यार की बातें सुनी थीं। फिर भी तुझे उनपर इतना प्रेम है? और वह इतने निर्दयी हैं कि न जाने कहाँ बैठे हुए हैं, सुधि नहीं लेते। वह मुझसे अप्रसन्न हैं, लेकिन तूने क्या अपराध किया है? तुझसे क्यों रुष्ट हैं? नाथ! तुमने मेरे कारण अपने आँखों के तारे पुत्र को क्यों त्याग दिया? तुम्हें क्या मालूम कि जिस पुत्र की ओर से तुमने अपना हृदय पत्थर कर लिया है, वह तुम्हारे नाम की उपासना करता है, तुम्हारी मूर्ति की पूजा करता है। आह! वह वियोगाग्नि उसके कोमल हृदय को क्या जला न डालेगी? क्या इस राज्य को पाने का यह दंड है? इस अभागे राज्य ने हम दोनों को अनाथ कर दिया।

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