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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


अहिल्या का मातृहृदय करुणा से पुलकित हो उठा। उसने शंखधर को छाती से लगा लिया और आँसुओं के वेग को दबाती हुई बोली–बेटा, तुम्हारा उठने को जी न चाहता हो, तो यहीं लाऊँ? बैठे-बैठे कुछ थोड़ा खा लो।

शंखधर–अच्छा, खा लूँगा। अम्माँ, किसी से खाना भेजवा दो,  तुम क्यों लाओगी।

अहिल्या एक क्षण में छोटी-सी थाली में भोजन लेकर आयी और शंखधर के सामने बैठ गई।

शंखधर को इस समय खाने की रुचि न थी, यह बात नहीं थी। अब तक उसे निश्चिय रूप से अपने पिता के विषय में कुछ मालूम हुआ था। वह जानता था कि वह किसी दूसरी जगह आराम से होगें। आज उसे यह मालूम हुआ था कि संन्यासी हो गए हैं, अब वह राजसी भोजन कैसे करता? इसीलिए उसने अहिल्या से कहा था कि भोजन किसी के हाथ भेज देना, तुम न आना। अब यह थाल देखकर वह बड़े-धर्म-संकट में पड़ा। अगर नहीं खाता, तो अहिल्या दुःखी होती है और खाता है, तो कौर मुँह में नहीं जाता। उसे ख़याल आया, मैं यहाँ चाँदी के थाल में मोहनभोग उड़ाने बैठा हूँ और बाहूजी पर इस समय न जाने क्या गुज़र रही होगी। बेचारे किसी पेड़ के नीचे पड़े होंगे, न जाने आज खाया भी है या नहीं। वह थाली पर बैठा; लेकिन कौर उठाते ही फूट-फूटकर रोने लगा। अहिल्या उसके मन का भाव ताड़ गई और स्वयं रोने लगी। कौन किसे समझाता?

आज से अहिल्या को हरदम यही संशय रहने लगा कि शंखधर पिता की खोज में कहीं भाग न जाए। वह उसे अकेले कहीं खेलने तक न जाने देती, उसका बाज़ार भी आना-जाना बन्द हो गया। उसने सबको मना कर दिया कि शंखधर के सामने उसके पिता की चर्चा न करें। यह भय किसी भयंकर जन्तु की भाँति उसे नित्य घूरा करता था कि कहीं शंखधर अपने पिता के गृह-त्याग का कारण न जान ले, कहीं वह यह न जान जाए कि बाबूजी को राजपाट से घृणा है; नहीं तो फिर इसे कौन रोकेगा?

उसे अब हरदम यही पछतावा होता रहता कि मैं शंखधर को लेकर स्वामी के साथ क्यों न चली गयी? राज्य के लोभ में वह पति को पहले ही खो बैठी, कहीं पुत्र को भी तो न खो बैठेगी? सुख और विलास की वस्तुओं से शंखधर की दिन-दिन बढ़नेवाली उदासीनता देख-देखकर वह चिन्ता के मारे और भी घुली जाती थी।

३८

ठाकुर हरिसेवकसिंह का क्रिया-कर्म हो जाने के बाद एक दिन लौंगी ने अपना कपड़ा-लत्ता बाँधना शुरू किया। उसके पास रुपये-पैसे जो कुछ थे, सब गुरुसेवक को सौंपकर बोली–भैया अब किसी गाँव में जाकर रहूँगी, यहाँ मुझसे नहीं रहा जाता।

वास्तव में लौंगी से अब इस घर में न रहा जाता था। घर की एक-एक चीज़ को काटने दौड़ती थी। २५ वर्ष तक इस घर की स्वामिनी बनी रहने के बाद अब वह किसी की आश्रिता न बन सकती थी। सब कुछ उसी के हाथों का किया हुआ था; पर अब उसका न था। यह घर उसी ने बनवाया था। उसने घर बनवाने पर ज़ोर न दिया होता, तो ठाकुर साहब अभी तक किसी किराए के घर में पड़े होते। घर का सारा सामान उसी का ख़रीदा हुआ था; पर अब उसका कुछ न था। सब कुछ स्वामी के साथ चला गया। वैधव्य के शोक के साथ यह भाव कि मैं किसी दूसरे की रोटियों पर पड़ी हूँ, उसके लिए असह्य था। हालाँकि गुरुसेवक पहले से अब कहीं ज़्यादा उसका लिहाज करते थे और कोई ऐसी बात न होने देते थे, जिससे उसे रंज हो। फिर भी कभी-कभी ऐसी बातें हो ही जाती थीं, जो उसकी पराधीनता की याद दिला देती थीं। कोई नौकर अब उससे माँगने न आता था; रियासत के कर्मचारी अब उसकी खुशामद करने न आते थे। गुरुसेवक और उसकी स्त्री के व्यवहार में तो किसी तरह की त्रुटि न थी।

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