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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
लौंगी को उन लोगों से जैसी आशा थी, उससे कहीं अच्छा बर्ताव उनके साथ किया जाता था; लेकिन महरियाँ अब खड़ी जिसका मुँह जोहती हैं, वह कोई और ही है; नौकर जिसका हुक्म सुनते दौड़कर आते हैं, वह भी और ही कोई है। देहात के असामी नज़राने या लगान के रुपये अब उसके हाथ में नहीं देते, शहर की दूकानों के किरायेदार भी अब उसे किराया देने नहीं आते। गुरुसेवक ने अपने मुँह से किसी से कुछ नहीं कहा। प्रथा और रुचि ने आप-ही-आप सारी व्यवस्था उल्ट-पल्ट कर दी है। पर ये ही वे बातें हैं, जिनसे उसके ग्लानि आहत हृदय को ठेस लगती है और उसकी मधुर स्मृतियों में एक क्षण के लिए ग्लानि की छाया आ पड़ती है। इसीलिए अब वह यहाँ से जाकर किसी देहात में रहना चाहती है। आख़िर जब ठाकुर साहब ने उसके नाम कुछ नहीं लिखा, उसे दूध की मक्खी की भाँति निकालकर फेंक दिया, तो वह यहाँ क्यों पड़ी दूसरों का मुँह जोहे। उसे अब एक टूटे-फूटे झेंपड़े और एक टुकड़े रोटी के सिवा और कुछ नहीं चाहिए। इसके लिए वह अपने हाथों से मेहनत कर सकती है। जहाँ रहेगी, वहीं अपने गुज़र भर को कमा लेगी। उसने जो कुछ किया, यह उसी का तो फल है। वह अपनी झोंपड़ी में पड़ी रहती, तो आज क्यों यह अनादर और अपमान होता? झोंपड़ी छोड़कर महल के सुख का यही दंड है।
गुरुसेवक ने कहा–आख़िर सुनें तो, कहाँ जाने का विचार कर रही हो?
लौंगी–जहाँ भगवान् ले जाएँगे, वहाँ चली जाऊँगी; कोई नैहर या दूसरी ससुराल है, जिसका नाम बता दूँ?
गुरुसेवक–सोचती हो, तुम चली जाओगी, तो मेरी कितनी बदनामी होगी? दुनिया यही कहेगी कि इनसे एक बेवा का पालन न हो सका। उसे घर से निकल निकाल दिया। मेरे लिए कहीं मुँह दिखाने की भी जगह न रहेगी। तुम्हें इस घर में जो शिकायत हो, वह मुझसे कहो; जिस बात की ज़रूरत हो, मुझसे बतला दो। अगर मेरी तरफ़ से उसमें ज़रा भी कोर-कसर देखो, तो फिर तुम्हें अख़्तियार है, जो चाहे करना। यों मैं कभी न जाने दूँगा।
लौंगी–क्या बाँधकर रखोगे?
गुरुसेवक–हाँ, बाँधकर रखेंगे।
अगर उम्र भर में लौंगी को गुरुसेवक की कोई बात तो पसंद आयी तो उनका यही दुराग्रहपूर्ण वाक्य था। लौंगी का हृदय पुलकित हो गया। इस वाक्य में उसे आत्मीयता भरी हुई जान पड़ी। उसने ज़रा तेज़ होकर कहा–बाँधकर क्यों रखोगे? क्या तुम्हारी बेसाही हूँ।
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