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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
गुरुसेवक–हाँ, बेसाही हो! मैंने नहीं बेसाहा, मेरे बाप ने तो बेसाहा है। बेसाही न होतीं, तो तुम तीस साल यहाँ रहतीं कैसे? कोई और आकर क्यों न रह गई? दादाजी चाहते, तो एक दर्जन ब्याह कर सकते थे, कौंडियों रखेलियाँ रख सकते थे। यह सब उन्होंने क्यों नहीं किया? जिस वक़्त मेरी माता का स्वर्गवास हुआ, उस वक़्त उनकी जवानी की उम्र थी; मगर उनका कट्टर शत्रु भी आज यह कहने का साहस नहीं कर सकता कि उनके आचरण ख़राब थे। यह तुम्हारी ही सेवा की जंजीर थी, जिसने उन्हें बाँध रखा, नहीं तो आज हम लोगों का कहीं पता न होता। मैं सत्य कहता हूँ, अगर तुमने घर के बाहर कदम निकाला तो चाहे दुनिया मुझे बदनाम ही करे, मैं तुम्हारे पैर तोड़कर रख दूँगा। क्या तुम अपने मन की हो कि जो चाहोगी, करोगी, और जहाँ चाहोगी, जाओगी और कोई न बोलेगा? तुम्हारे नाम के साथ मेरी और मेरे पूज्य बाप की इज़्ज़त बँधी हुई है।
लौंगी के जी में आया कि गुरुसेवक के चरणों पर सिर रख रोऊँ और छाती से लगाकर कहूँ–बेटा मैंने तो तुझे गोद में खिलाया है, तुझे छोड़कर भला मैं कहाँ जा सकती हूँ! लेकिन उसने क्रुद्ध भाव से कहा–यह तो अच्छी दिल्लगी हुई। यह मुझे बाँधकर रखेंगे!
गुरुसेवक तो झल्लाए हुए बाहर चले गये और लौंगी अपने कमरे में जाकर खूब रोयी। गुरुसेवक क्या किसी महरी से कह सकते थे–हम तुम्हें बाँधकर रखेंगे? कभी नहीं; लेकिन अपनी स्त्री से वह यह बात कह सकते हैं; क्योंकि उसके साथ उनकी इज़्ज़त बँधी हुई है। थोड़ी देर के बाद वह एक महरी से बोली–सुनती है रे, मेरे सिर दर्द हो रहा है। ज़रा आकर दबा दे।
आज कई महीने के बाद लौंगी ने सिर दबाने का हुक्म दिया था। इधर उसे किसी से कुछ कहते हुए संकोच होता था कि कहीं यह टाल न जाए। नौकरों के दिल में उसके प्रति वही श्रद्धा थी, जो पहले थी। लौंगी ने स्वयं उनसे कुछ काम लेना छोड़ दिया था। इन झगड़ों की भनक भी नौकरों के कानों में पड़ गई थी। उन्होंने अनुमान किया था कि गुरुसेवक ने लौंगी को किसी बात पर डाँटा हैं, इसलिए सम्भावत: उनकी सहानुभूति लौंगी के साथ हो गई थी। वे आपस में इस विषय पर मनमानी टिप्पणियाँ कर रहे थे। महरी उसका हुक्म सुनते ही तेल लाकर उसका सिर दबाने लगी। उसे मनोभावों को प्रकट करने के लिए यह अवसर बहुत ही उपयुक्त जान पड़ा। बोली–आज छोटे बाबू किस बात पर बिगड़ रहे थे मालकिन? कमरे के बाहर सुनाई दे रहा था। तुम यहाँ से चली गयीं मालकिन, तो एक नौकर भी न रहेगा। सबों ने सोच लिया है कि जिस दिन मालकिन यहाँ से चली जाएँगी, हम सब भी भाग खड़े होंगे। अन्याय हम लोगों से नहीं देखा जाता।
लौंगी ने दीन भाव से कहा–नसीब ही खोटा है, नहीं तो क्यों किसी की झिड़कियाँ सुननीं पड़तीं?
महरी–नहीं मालकिन, नसीबों को न खोटा कहो। नसीब तो जैसा तुम्हारा है, वैसे किसी का क्या होगा? ठाकुर साहब मरते दम तक तुम्हारा नाम रटा किए। तुम क्यों जाती हो, किसी की मज़ाल क्या है कि तुमसे कुछ कह सके? यह सारी सम्पदा तो तुम्हारी जोड़ी हुई है। इसे कौन ले सकता है? ठाकुर साहब को जो तुमसे सुख मिला, वह क्या किसी ब्याहता से मिल सकता था?
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