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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


सहसा मनोरमा ने कमरे में प्रवेश किया और लौंगी सिर में तेल डलवाते देखकर बोली–कैसा जी है अम्माँ! सिर दर्द है क्या?

लौंगी–नहीं बेटा, जी तो अच्छा है। आओ बैठो।

मनोरमा ने महरी से कहा–तुम जाओ, मैं दबाए देती हूँ। दरवाजे पर खड़ी होकर कुछ सुनना नहीं, दूर चली जाना।

महरी इस समय यहाँ की बातें सुनने के लिए अपना सर्वस्व दे सकती थी, यह हुक्म सुनकर मन में मनोरमा को कोसती हुई चली गयी। मनोरमा सिर दबाने बैठी, तो लौंगी ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली–नहीं बेटा, तुम रहने दो। दर्द नहीं था, यों ही बुला लिया था। नहीं, मैं न दबवाऊँगी। यह उचित नहीं है। कोई देखे तो कहे कि बुढ़िया पागल हो गई है, रानी से सिर दबवाती है।

मनोरमा ने सिर दबाते हुए कहा–रानी जहाँ हूँ, यहाँ तो तुम्हारी गोद की खिलायी नोरा हूँ। आज तो भैयाजी यहाँ से जाकर तुम्हारे ऊपर बहुत बिगड़ते रहे। मैं उसकी टाँग तोड़ दूँगा, गर्दन काँट लूँगा।  कितना पूछा, कुछ बताओ तो, बात क्या है? पर गुस्से में कुछ सुनें ही न। भाई हैं तो क्या; पर उनका अन्याय मुझसे भी नहीं देखा जाता। वह समझते होंगे कि इस घर का मालिक हूँ, दादाजी मेरे नाम सब छोड़ गए थे।मैं जिसे चाहूँ, रखूँ; जिसे चाहूँ निकालूँ। मगर दादाजी उनकी नीयत को पहले ताड़ गए थे। मैंने अब तक तुमसे नहीं कहा अम्माँजी। कुछ तो मौक़ा न मिला और कुछ भैया का लिहाज़ था; पर आज उनकी बातें सुनकर कहती हूँ कि पिताजी ने अपनी सारी ज़ायदाद तुम्हारे नाम लिख दी है।

लौंगी पर इस सूचना का ज़रा भी असर नहीं हुआ। किसी प्रकार का उल्लास, उत्सुकता या गर्व उसके चेहरे पर न दिखाई दिया। वह उदासीन भाव से चारपाई पर पड़ी रही।

मनोरमा ने फिर कहा–मेरे पास उनकी लिखायी वसीयत रखी हुई है और मुझी को उन्होंने उसका साक्षी बनाया है। जब ये महाशय वसीयत देखेंगे, तो आँखें खुलेंगी।

लौंगी ने गम्भीर स्वर में कहा–नोरा, यह वसीयतनामा ले जाकर उन्हीं को दे दो। तुम्हारे दादाजी ने व्यर्थ ही वसीयत लिखायी। मैं उनकी ज़ायदाद की भूखी न थी। उनके प्रेम की भूखी थी। और ईश्वर को साक्षी देकर कहती हूँ बेटी, कि इस विषय में मेरे जैसा भाग्य बहुत कम स्त्रियों का होगा। मैं उनका प्रेम-धन पाकर ही सन्तुष्ट हूँ। इसके सिवा और मुझे और किसी धन की इच्छा नहीं है। अगर मैं अपने सच पर हूँ, तो मुझे रोटी-कपड़े का कष्ट कभी न होगा। गुरुसेवक को मैंने गोद में खिलाया है, उसे पाला-पोसा है। वह मेरे स्वामी का बेटा है। उसका हक़ मैं किस तरह छीन सकती हूँ? उसके सामने की थाली कैसे खींच सकती हूँ? वह काग़ज़ फाड़कर फेंक दो। यह काग़ज़ लिखकर उन्होंने अपने साथ और गुरुसेवक के साथ अन्याय किया है। गुरुसेवक अपने बाप का बेटा है, तो मुझे उसी आदर से रखेगा। वह मुझे माने या न माने, मैं उसे अपना ही समझती हूँ! तुम सिरहाने बैठी मेरा सिर दबा रही हो, क्या धन में इतना सुख कभी मिल सकता है। गुरुसेवक के मुँह से ‘अम्माँ’ सुनकर मुझे वह खुशी होगी, जो संसार की रानी बनकर भी नहीं हो सकती, तुम उनसे इतना ही कह देना।

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