|
उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
|
320 पाठक हैं |
राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
राजा साहब ज्यों-ज्यों इस विषय की मीमांसा करते थे, त्यों-त्यों उनकी शंका बढ़ती जाती थी। रात आधी से अधिक बीत गई थी! रनिवास में सन्नाटा छाया हुआ था। नौकर-चाकर भी सभी सो गए थे; पर उनकी आँखों में नींद न थी। वह शंका उन्हें उद्विग्न कर रही थी।
आख़िर राजा साहब से लेटे न रहा गया। वह चारपाई से उठे और आहिस्ता-आहिस्ता रोहिणी के कमरे की ओर चले। उसकी ड्योढ़ी पर चौकीदारिनी से भेंट हुई उन्हें इस समय यहाँ देखकर वह अवाक् रह गई। जिस भवन में इन्होंने बीस वर्ष तक कदम नहीं रखा, उधर आज कैसे भूल पड़े? उसने राजा साहब के मुख की ओर देखा, मानो पूछ रही थी–आप क्या चाहते हैं?
राजा साहब ने पूछा–छोटी रानी क्या कर रही हैं?
चौंकीदारिन ने कहा–इस समय तो सरकार सो रही होंगी। महाराज का कोई सन्देश हो, तो पहुँचा दूँ।
राजा ने कहा–नहीं, मैं खुद जा रहा हूँ, तू यहीं रह।
राजा साहब ने कमरे के द्वार पर खड़े होकर भीतर की ओर झाँका। रोहिणी मसहरी के अन्दर चादर ओढ़े सो रही थी। वह अन्दर कदम रखते हुए झिझके। भय हुआ कि कहीं रोहिणी उठकर कह न बैठे–आप यहाँ क्यों आए? वह इसी दुविधा में आधा घंटे तक खड़े रहे। कई बार धीरे-धीरे पुकारा भी; पर रोहिणी न मिनकी। इतनी देर में उसने एक बार भी करवट न ली। यहाँ तक कि उसकी साँस भी न सुनाई दी। ऐसा मालूम हो रहा था कि वह मक्र किए पड़ी है और देख रही है कि राजा साहब क्या करते हैं। शायद परीक्षा ले रही है कि अब भी इनका दिल साफ़ हुआ या नहीं। ग़ाफिल नींद में पड़े हुए प्राणी की श्वास-क्रिया इतनी नि:शब्द नहीं हो सकती। ज़रूर बहाना किए हुए पड़ी है, मेरी आहट पाकर चादर ओढ़ ली होगी। मान के साथ इसके स्वभाव में विनोद भी तो बहुत है! पहले भी तो इस तरह की नक़लें किया करती थी। मुझे आते देखकर कहीं छिप जाती और जब मैं निराश होकर बाहर जाने लगता, तो हँसती हुई न जाने किधर से निकल आती। उसके चुहल और दिल्लगी की कितनी ही पुरानी बातें राजा साहब को याद आ गईं। उन्होंने साहस करके कमरे में कदम रखा; पर अब भी किसी तरह का शब्द न सुनकर उन्हें ख़्याल आया, कहीं रोहिणी ने झूठ चादर तो नहीं तान दी है। मुझे चक्कर में डालने के लिए चारपाई पर चादर तान दी हो और आप किसी जगह छिपी हो। वह उसके धोखे में नहीं आना चाहते थे। उन्हें एक पुरानी बात याद आ गई, जब रोहिणी ने उनके साथ इसी तरह की दिल्लगी की थी, और यह कहकर उन्हें खूब आड़े हाथों लिया था कि आपकी प्रिया तो वह हैं, जिन्हें आपने जगाया है, मैं आपकी कौन होती हूँ? जाइए, उन्हीं से बोलिए–हँसिए। वह विनोदिनी आज फिर वही अभिनय कर रही है। इस अवसर के लिए कोई चुभती हुई बात गढ़ रखी होगी–बीस बरस के बाद सूरत क्या याद रह सकती है? राजा साहब का साठवाँ साल था; लेकिन इस वक़्त उन्हें इस क्रीड़ा में यौवन काल का-सा आनन्द और कुतूहल हो रहा था। वह दिखाना चाहते थे कि वह उसका कौशल ताड़ गए, वह उन्हें धोखा न दे सकेगी। लेकिन जब लगभग आधे घंटे तक खड़े रहने पर भी कोई आवाज़ या आहट न मिली, तो उन्होंने चारों तरफ़ चौकन्नी आँखों से देखकर धीरे से चादर हटा दी। रोहिणी सोयी हुई थी; लेकिन जब झुककर उसके मुख की ओर देखा, तो चौंककर पीछे हट गए। वह रोहिणी न थी, रोहिणी का शव था। बीस वर्ष की चिन्ता, दु:ख, ईर्ष्या और नैराश्य के संताप से जर्जर आत्मा के रहने योग्य कब रह सकता था! उन निर्जीव, स्थिर, अनिमेष नेत्रों में अब भी अतृप्त आकांक्षा झलक रही थी। उनमें तिरस्कार था, व्यंग्य था, गर्व था। दोनों ज्योतिहीन आँखें परित्यक्ता के जीवन की ज्वलन्त आलोचनाएँ थीं। जीवन की सारी व्यथाएँ उनमें सार रूप से व्यक्त हो रही थीं। वे तीक्ष्ण वाणों के समान राजा साहब के हृदय में चुभी जा रही थीं, मानों कह रही थीं–अब तो तुम्हारा कलेजा ठण्डा हुआ। अब मीठी नींद सोओ, मुझे परवाह नहीं है।
|
|||||











