लोगों की राय

उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

320 पाठक हैं

राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


राजा साहब ने दोनों आँखें बन्द कर लीं और रोने लगे। उनकी आत्मा इस अमानुषीय निष्ठुरता पर उन्हें धिक्कार रही थी। किसी प्राणी के प्रति अपने कर्तव्य का ध्यान हमें उसके मरने के बाद ही आता है–हाय! यह मेरी रानी, जिस पर एक दिन मैं अपने प्राण न्यौछावर करता था, इस दीन दशा में पड़ी हुई है, न कोई आगे न कोई पीछे! कोई एक घूंट पानी देने वाला न था। कोई मरते समय परितोष देनेवाला भी न था। राजा साहब को ज्ञात हुआ कि रोहिणी आज क्यों उनके पास गई थी! वह मुझे सूचना दे रही, लेकिन बुद्धि पर पत्थर पड़ गया था। उस समय भी मैं कुछ न समझा। आह! अगर उस वक़्त उसका आशय समझा जाता, तो यह नौबत क्यों आती? उस वक़्त भी यदि मैंने एक बार शुद्ध हृदय से कहा होता–प्रिये, मेरा अपराध क्षमा करो, तो इसके प्राण बच जाते। अन्तिम समय वह मेरे पास क्षमा का संदेश ले गई थी और मैं कुछ न समझा! आशा का अन्तिम आदेश उसे मेरे पास ले गया; पर शोक!

सहसा राजा को ख़याल आया–शायद अभी प्राण बच जाएँ। उन्होंने चौकीदारिन को पुकारा, बोले–ज़रा जाकर दरबान से कह दे, डॉक्टर साहब को बुला लाए। इनकी दशा अच्छी नहीं है। चौकीदारिनी रानी देवप्रिया के समय की स्त्री थी। रोहिणी के मुख की ओर देखकर बोली–डॉक्टर को बुलाकर क्या कीजिएगा? अगर अभी कुछ कसर रह गई हो, तो वह भी पूरी कर दीजिए। अभागिनी मरज़ाद ढोती रह गई! उसके ऊपर क्या बीती, तुम क्या जानोगे? तुम तो बुढ़ापे में विवाह करके बुद्धि और लज्जा दोनों ही खो बैठे। उसके ऊपर जो बीती, वह मैं जानती हूँ। हाय! रक्त के आँसू रो-रोकर बेचारी मर गई और तुम्हें दया न आई? क्या समझते हो, इसने विष खा लिया? इसने ढाँचे से प्राण को निकालने के लिए विष का क्या काम था? उसके मरने का आश्चर्य नहीं, आश्चर्य यह है कि वह इतने दिन जीती कैसे रही! खैर, जीते-जी जो अभिलाषा न पूरी की, वह मरने पर तो पूरी कर दी। इतनी ही दया अगर पहले की होती, तो इसके लिए वह अमृत हो जाती!

दम-के-दम में रनिवास में शोर मच गया और रानियाँ-बाँदियाँ सब आकर ज़मा हो गईं।

मगर मनोरमा न आई।

४०

रोहिणी की मृत्यु के बाद राजा साहब जगदीशपुर न रह सके। मनोरमा का भी जी वहाँ घबराने लगा। उसी के कारण मनोरमा को वहाँ रहना पड़ता था। जब वही न रही, तो किस पर रीस करती? उसे अब दु:ख होता था कि मैं नाहक यहाँ आई। रोहिणी के कटु वाक्य सह लेती, तो आज उस बेचारी की जान पर क्यों बनती? मनोरमा इस ग्लानि को मन से न निकाल सकती थी कि मैं ही रोहिणी की अकाल-मृत्यु का हेतु हुई। राजा साहब की निग़ाह भी अब उसकी ओर से फिरी हुई मालूम होती थी। अब खजांची उतनी तत्परता से उसकी फरमाइशें नहीं पूरी करता। राजा साहब भी अब उसके पास बहुत कम आते हैं। यहाँ तक कि गुरुसेवकसिंह को भी जवाब दे दिया है, और उन्हें रनिवास में आने की मनाही कर दी गई है। रोहिणी ने प्राण देकर मनोरमा पर विजय पाई है। अब वसमुती और रामप्रिया पर राजा साहब की कुछ विशेष कृपा हो गई है। दूसरे-तीसरे दिन जगदीशपुर चले जाते हैं और कभी-कभी दिन को भोजन भी वहीं करते हैं। वह अब अपने पापों का प्रायश्चित कर रहे हैं। रियासत में अब अन्धेर भी ज़्यादा होने लगा है। मनोरमा की खोली हुई शालाएँ बन्द होती जा रही हैं। मनोरमा सब देखती और समझती है; पर मुँह नहीं खोल सकती। उसके सौभाग्य-सूर्य का पतन हो रहा है। वही राजा साहब, जो उससे बिना कहे, सैर करने भी न जाते थे, अब हफ्तों उसकी तरफ़ झाँकते तक नहीं। नौकरों-चाकरों पर भी उसका प्रभाव नहीं रहा। वे उसकी बातों की परवाह नहीं करते। इन गँवारों को हवा का रुख पहचानते देर नहीं लगती। रोहिणी का आत्म-बलिदान निष्फल नहीं हुआ।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book