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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
शंखधर को अब एक नई चिन्ता हो गई है। राजा साहब के रूठने से छोटी नानीजी मर गईं। क्या पिताजी के रूठने से अम्माँजी का भी यही हाल होगा? अम्माँजी भी तो दिन-दिन घुलती जाती हैं। जब देखो, तब रोया करती हैं। उसका नाम स्कूल में लिखा दिया गया है। स्कूल से छुट्टी पाकर वह सीधे लौंगी के पास जाता है और उससे तीर्थयात्रा की बातें पूछता है। यात्री लोग कहाँ ठहरते हैं, क्या खाते हैं। जहाँ रेलें नहीं हैं, वहाँ लोग कैसे जाते हैं, चोर तो नहीं मिलते? लौंगी उसके मनोभावों को ताड़ती है; लेकिन इच्छा न होते हुए भी उसे सारी बातें बतानी पड़ती हैं। वह झुँझलाती है, घुड़क बैठती है; लेकिन जब वह किशोर आग्रह करके उसकी गोद में बैठ जाता है, तो उसे दया आ जाती है, छुट्टियों के दिन शंखधर पितृगृह के दर्शन करने अवश्य जाता है। वह घर उसके तीर्थ हैं, वह भक्त की श्रद्धा और उपासक के प्रेम से उस घर में कदम रखता है, और जब तक वहाँ रहता है उस पर भक्ति-गर्व का नशा-सा छाया रहता है। निर्मला की आँखें उसे देखने से तृप्त ही नहीं होतीं। उससे घर में आते ही प्रकाश-सा फैल जाता है। वस्तुओं की शोभा बढ़ जाती है। दादा और दादी दोनों उसकी बालोत्साह से भरी बातें सुनकर मुग्ध हो जाते हैं; उनके हृदय पुलकित हो उठते हैं। ऐसा जान पड़ता है, मानो चक्रधर स्वयं बालरूप धारण करके उनका मन हरने आ गया है।
एक दिन निर्मला ने कहा–बेटा, तुम यही आके क्यों नहीं रहते? तुम चले जाते हो, तो घर काटने दौड़ता है।
शंखधर ने कुछ सोचकर गम्भीर भाव से कहा–अम्माँजी तो आती ही नहीं। वह क्यों कभी यहाँ नहीं आतीं, दादीजी?
निर्मला–क्यों जाने बेटा, मैं उनके मन की बात क्या जानूँ? तुम कभी कहते नहीं। आज कहना, देखो क्या कहती हैं।
शंखधर–नहीं दादाजी, वह रोने लगेंगी। जब थोड़े दिनों में मैं गद्दी पर बैठूँगा, तो यही मेरा राजभवन होगा। तभी अम्माँजी आएँगी।
निर्मला–जल्दी से बैठो बेटा, हम भी देख लें।
शंखधर–मैं बाबूजी के नाम से एक स्कूल खोलूँगा; देख लेना। उनमें किसी लड़के से फीस न ली जाएगी।
वज्रधर–और हमारे लिए क्या करोगे बेटा?
शंखधर–आपके लिए अच्छे-अच्छे सितारिये बुलाऊँगा। आप उनका गाना सुना दीजिएगा। आपको गाना किसने सिखाया, दादाजी?
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