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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


वज्रधर–मैंने तो एक साधु से यह विद्या सीखी बेटा! बरसों उनकी ख़िदमत की तब कहीं जा सके वह प्रसन्न हुए। उन्होंने मुझे ऐसा आशीर्वाद दिया कि थोड़े ही दिनों में मैं गाने-बजाने में पक्का हो गया। तुम भी सीख लो बेटा; मैं बड़े शौक़ से सिखाऊँगा। राजाओं-महाराजाओं के लिए तो यह विद्या है ही, बेटा, वहीं तो गुणियों का गुण परखकर उनका आदर कर सकते हैं। जिन्हें यह विद्या आ गई, बस, समझ लो कि उन्हें किसी बात की कमी न रहेगी। वह जहाँ रहेगा, लोग उसे सिर-आँखों पर बिठाएँगे। मैंने तो एक बार इसी विद्या की बदौलत बद्रीनाथ की यात्रा की थी। पैदल चलता था। जिस गाँव में शाम हो जाती, किसी भले आदमी के द्वार चला जाता और दो-चार चीज़ें सुना देता। बस, मेरे लिए सभी बातों का प्रबन्ध हो जाता था।

शंखधर ने विस्मित होकर कहा–सच! तब तो मैं ज़रूर सीखूँगा।

वज्रधर–ज़रूर सीख लो बेटा! लाओ आज ही से आरम्भ कर दूँ।

शंखधर को संगीत से स्वाभाविक प्रेम था। ठाकुरद्वारे में जब गाना होता, वह बड़े चाव से सुनता। खुद भी एकान्त में बैठा गुनगुनाया करता था। ताल स्वर का ज्ञान उसे सुनने से ही हो गया था। एक बार भी कोई राग सुन लेता, तो उसे याद हो जाता। योगियों के कितने ही गीत उसे याद थे। खँजरी बजाकर वह सूर, कबीर, मीरा आदि सन्तों के पद गाया करता था। इस वक़्त जो उसने कबीर का एक पद गाया, तो मुंशीजी उसके संगीत-ज्ञान और स्वर-लालित्य पर मुग्ध हो गए। बोले–बेटा, तुम तो बिना सिखाए ही ऐसा गा लेते हो। तुम्हें तो मैं थोड़े ही दिनों में ऐसा बना दूँगा कि अच्छे-अच्छे उस्ताद कानों पर हाथ धरेंगे। आख़िर मेरे ही पोते तो हो। बस, तुम मेरे नाम पर एक संगीतालय खोल देना।

शंखधर–जी हाँ, उसमें यही विद्या सिखायी जाएगी।

निर्मला–अपनी बुढ़िया दादीजी के लिए क्या करोगे, बेटा?

शंखधर–तुम्हारे लिए एक डोली रख दूँगा, जिसे दो कहार ढोएँगे। उसी पर बैठकर तुम नित्य गंगास्नान करने जाना।

निर्मला–मैं डोली पर न बैठूँगी। लोग हँसेंगे कि नहीं, कि राजा साहब की दादी डोली पर बैठी जा रही हैं।

शंखधर–वाह! ऐसे आराम की सवारी और कौन होगी?
 इस तरह दोनों प्राणियों का मनोरंजन करके जब वह चलने लगा, तो निर्मला द्वार पर खड़ी हो गई, जहाँ से वह मोटर को दूर जाते तक देखती रहे।

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