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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
अहिल्या तश्तरी में मिठाइयाँ और मेवे लायी और एक लौंडी से पानी लाने को कहकर बेटे से बोली–वहाँ तो कुछ जलपान न किया होगा, खा लो। आज तुम इतने उदास क्यों हो?
शंखधर ने तश्तरी की ओर बिना देखे ही कहा–इस वक़्त तो खाने को जी नहीं चाहता, अम्माँ!
एक क्षण के बाद उसने कहा–क्या जाने बेटा, याद आती तो काले कोसों बैठे रहते!
शंखधर–क्या वह बड़े निष्ठुर हैं, अम्माँ?
अहिल्या रो रही थी, कुछ न बोल सकी।
शंखधर–मुझे देखें, तो पहचान जाएँ कि नहीं, अम्माँजी?
अहिल्या फिर भी कुछ न बोली–उसका कंठ-स्वर अश्रुप्रवाह में डूबा जा रहा था।
शंखधर ने फिर कहा–मुझे तो मालूम होता है अम्माँजी, कि वह बहुत ही निर्दयी हैं, इसी से उन्हें हम लोगों का दुःख नहीं जान पड़ता। अगर वह भी इसी तरह रोते, तो ज़रुर आते। मुझे एक दफ़ा मिल जाते, तो मैं उन्हें कायल कर देता। आप न जाने कहाँ बैठे हैं, किसी का क्या हाल हो रहा है, इसकी सुधि ही नहीं। मेरा तो कभी-कभी ऐसा होता है कि देखूँ तो प्रणाम तक न करूँ, कह दूँ–आप मेरे होते कौन हैं, आप ही ने तो हम लोगों को त्याग दिया है।
अब अहिल्या चुप न रह सकी, काँपते स्वर में बोली–बेटा, उन्होंने हमें त्याग नहीं दिया है। वहाँ उनकी जो दशा हो रही होगी, उसे मैं जानती हूँ। हम लोगों की याद एक क्षण के लिए भी उनके चित्त से न उतरती होगी। खाने-पीने का ध्यान भी न रहता होगा। हाय! यह सब मेरा दोष है बेटा। उनका कोई दोष नहीं।
शंखधर ने कुछ लज्जित होकर कहा–अम्माँजी, यदि मुझे देखें, तो वह पहचान जाएँ कि नहीं?
अहिल्या–तुझे? मैं तो जानती हूँ, न पहचान सकें। तब तू बिलकुल ज़रा-सा बच्चा था। आज उनको गये दसवाँ साल है। न जाने कैसे होंगे। मैं तो तुम्हें देख-देखकर जीती हूँ, वह किसको देखकर दिल को ढांढस देते होंगे। भगवान् करे, जहाँ रहें, कुशल से रहें। बदा होगा; तो कभी भेंट हो ही जाएगी।
शंखधर अपनी ही धुन में मस्त था, उसने यह बातें सुनी ही नहीं। बोला–लेकिन अम्माँजी, मैं तो उन्हें देखकर फ़ौरन पहचान जाऊँ? वह चाहे किसी भेष में हों, मैं पहचान लूँगा।
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