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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
अहिल्या–नहीं बेटा, तुम भी उन्हें न पहचान सकोगे। तुमने उनकी तसवीरें ही तो देखी हैं। ये तसवीरें बारह साल पहले की हैं। फिर उन्होंने केश भी बढ़ा लिये होंगे।
शंखधर ने कुछ जवाब न दिया। बगीचे में जाकर दीवारों को देखता रहा। फिर अपने कमरे में आया और चुपचाप बैठकर सोचने लगा। उसका मन भक्ति और उल्लास से भरा हुआ था। क्या मैं ऐसा बहुत छोटा हूँ? मेरा तेरहवाँ साल है, छोटा नहीं हूँ। इसी उम्र में कितने ही आदमियों ने बड़े-बड़े काम कर डाले हैं। मुझे करना ही क्या है? दिन भर गलियों में घूमना और संध्या समय कहीं पड़े रहना। यहाँ लोगों की क्या दशा होगी, इसकी उसे चिन्ता न थी। राजा साहब पागल हो जाएँगे, मनोरमा रोते-रोते अँधी हो जाएगी, अहिल्या शायद प्राण देने पर उतारू हो जाए, इसकी उसे इस वक़्त बिलकुल फ़िक्र न थी। वह यहाँ से भाग निकलने के लिए विकल हो रहा था।
एकाएक उसे ख़याल आया, ऐसा न हो कि लोग मेरी तलाश में निकलें, थाने में हुलिया लिखाएँ, खुद भी परेशान हों, मुझे भी परेशान करें, इसीलिए उन्हें इतना बतला देना चाहिए कि मैं कहाँ और किस काम के लिए जा रहा हूँ। अगर किसी ने मुझे ज़बरदस्ती लाना चाहा, तो अच्छा न होगा। हमारी खुशी है, जब चाहेंगे, आएँगे; हमारा राज्य तो कोई नहीं उठा ले जाएगा। उसने एक काग़ज पर यह पत्र लिखा और अपने बिस्तरे पर रख दिया–
‘सबको, प्रणाम, मेरा कहा-सुना माफ़ कीजिएगा। मैं आज अपनी खुशी से पिताजी को खोजने जाता हूँ। आप लोग मेरे लिए ज़रा भी चिन्ता न कीजिएगा, न मुझे खोजने के लिए आइएगा; क्योंकि मैं किसी भी हालत में बिना पिताजी का पता लगाए न आऊँगा। जब तक एक बार दर्शन न कर लूँ और पूँछ न लूँ कि मुझे किस तरह से ज़िन्दगी बसर करनी चाहिए, तब तक मेरा जीना व्यर्थ है। मैं पिताजी को अपने साथ लाने की चेष्टा करूँगा। या तो उनके दर्शनों से कृतार्थ होकर लौटूँगा या इसी उद्योग में प्राण दे दूँगा। अगर मेरे भाग्य में राज्य करना लिखा है, तो राज्य करूँगा, भीख माँगना लिखा है, तो भीख माँगूगा; लेकिन पिताजी के चरणों की रज माथे पर बिना लगाए, उनकी कुछ सेवा किए बिना मैं घर न लौटूँगा। मैं फिर कहता हूँ कि मुझे वापस लाने की कोई चेष्टा न करे, नहीं तो मैं वहीं प्राण दे दूँगा। मेरे लिए यह कितनी लज्जा की बात है कि मेरे पिताजी तो देश-विदेश मारे-मारे फिरें और मैं चैन करूँ। यह दशा अब मुझसे नहीं सही जाती। कोई यह न समझे कि मैं छोटा हूँ, भूल-भटक जाऊँगा। मैंने ये सारी बातें अच्छी तरह सोच ली हैं। रुपये-पैसे की भी मुझे ज़रूरत नहीं। अम्माँजी, मेरी आपसे यही प्रार्थना है कि आप दादाजी की सेवा कीजिएगा, और समझाइएगा कि वह मेरे लिए चिन्ता न करें। रानी अम्माँ को प्रणाम, बाबाजी को प्रणाम।’
आधी रात बीत चुकी थी। शंखधर एक कुर्ता पहने हुए कमरे से निकला। बगल के कमरे में राजा साहब आराम कर रहे थे। वह पिछवाड़े की तरफ़ बाग़ में गया और एक अमरूद के पेड़ पर चढ़कर बाहर की तरफ़ कूद पड़ा। अब उसके लिए तारिकामंडिल नीला आकाश था, सामने विस्तृत मैदान और छाती में उल्लास, शंका और आशा से धड़कता हुआ हृदय। वह बड़ी तेज़ी से कदम बढ़ाता हुआ चला, कुछ नहीं मालूम कि किधर जा रहा है, तक़दीर कहाँ लिये जाती है।
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