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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


एक रमणी ने उसकी ओर देखकर पूछा–कहाँ से आते हो परदेशी, बीमार मालूम होते हो?

शंखधर ने आकाश की ओर अनिमेष नेत्रों से देखते हुए कहा–बीमार तो नहीं हूँ माता, दूर से आते-आते थक गया हूँ।

यह कहकर उसने अपनी खँज़री उठा ली और उसे बजाकर यह पद गाने लगा–

बहुत दिनों तक मौन-मंत्र
मन-मन्दिर में जपने के बाद।
पाऊँगी जब उन्हें प्रतीक्षा
के तप में तपने के बाद।
ले तब उन्हें अंक में नयनों
के जल  से  नहलाऊँगी।
सुमन चढ़ाकर प्रेम पुजारिन
मैं उनकी कहलाऊँगी!
ले अनुराग आरती उनकी
तभी उतारूँगी सप्रेम!
स्नेह सुधा नेवैद्य रूप में
सम्मुख रक्खूँगी कर प्रेम।
ले लूँगी वरदान भक्ति-वेदी
पर  बलि  हो जाने  पर।
साध तभी मन की साधूँगी
प्राणनाथ  के  आने  पर।


इस क्षीणकाय युवक के कंठ में इतना स्वर लालित्य, इतना विकल अनुराग था कि रमणियाँ चित्रवत् खड़ी रह गईं। कोई कुएँ में कलसा डाले हुए उसे खींचना भूल गई, कोई कलसे से रस्सी का फन्दा लगाते हुए उसे कुएँ में डाँलना भूल गई और कोई कूल्हे पर कलसा रखे आगे बढ़ना भूल गई–सभी मंत्र-मुग्ध-सी हो गईं। उनकी हृदय-वीणा से भी वही अनुरक्त ध्वनि निकलने लगी।

एक युवती ने पूछा–बाबाजी, अब तो बहुत देर हो गई है, यहीं ठहर जाओ न। आगे तो बहुत दूर तक कोई गाँव नहीं है।

शंखधर–आपकी इच्छा है माता, तो यहीं ठहर जाऊँगा। भला माताजी, यहाँ कोई महात्मा तो नहीं रहते?

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