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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
युवती–नहीं, यहाँ कोई साधु-संत नहीं हैं। हाँ, देवालय है।
दूसरी रमणी ने कहा–अभी कई दिन हुए, एक महात्मा आकर टिके थे; पर वह साधुओं के वेष में न थे। वह यहाँ एक महीने भर रहे। तुम एक दिन पहले यहाँ आ जाते, तो उनके दर्शन हो जाते।
एक वृद्धा बोली–साधु-संत तो बहुत देखे; पर ऐसा उपकारी जीव नहीं देखा तुम्हारा घर कहाँ है बेटा?
शंखधर–कहाँ बताऊँ माता, यों ही घूमता-फिरता हूँ।
वृद्धा–अभी तुम्हारे माता-पिता हैं न बेटा?
शंखधर–कुछ मालूम नहीं, माता! पिताजी तो बहुत दिन हुए, कहीं चले गए। मैं तब दो-तीन वर्ष का था। माताजी का हाल नहीं मालूम।
वृद्धा–तुम्हारे पिता क्यों चलें गए? तुम्हारी माता से कोई झगड़ा हुआ था?
शंखधर–नहीं माताजी, झगड़ा तो नहीं हुआ। गृहस्थी के माया-मोह में नहीं पड़ना चाहते थे।
वृद्धा–तो तुम्हें घर छोड़े कितने दिन हुए?
शंखधर–पाँच साल हो गए, माता! पिताजी को खोजने के लिए निकल पड़ा था; पर अब तक कहीं पता नहीं चला।
एक युवती ने अपनी सहेली के कंधे से मुँह छिपाकर कहा–इनका ब्याह हो तो गया होगा?
सहेली ने उसे कुछ उत्तर न दिया–वह शंखधर के मुँह की ओर ध्यान से देख रही थी। सहसा उसने वृद्धा से कहा–अम्माँ, इनकी सूरत महात्मा से मिलती है कि नहीं, कुछ तुम्हें दिखाई देता है?
वृद्धा–हाँ रे, कुछ-कुछ मालूम होता है। (शंखधर से) क्यों बेटा तुम्हारे पिताजी की क्या अवस्था होगी?
शंखधर–४० वर्ष के लगभग होगी और क्या।
वृद्धा–आँखें खूब बड़ी-बड़ी हैं?
शंखधर–हाँ माताजी, उतनी बड़ीं आँखें तो मैंने किसी की देखी ही नहीं।
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