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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


वृद्धा–लम्बे-लम्बे गोरे आदमी हैं?

शंखधर का हृदय धक-धक करने लगा। बोला–हाँ माताजी, उनका रंग गोरा है।

वृद्धा–अच्छा, दाहिनी ओर किसी चोट का दाग़ है?

शंखधर–हो सकता है, माताजी मैंने तो केवल उनका चित्र देखा है। मुझे तो वह दो वर्ष का छोड़कर घर से निकल गए थे।

वृद्धा–बेटा, जिन महात्मा की मैंने तुमसे चर्चा की है, उनकी सूरत तुमसे बहुत मिलती है।

शंखधर–माता, कुछ बता सकती हो, वह यहाँ से किधर गये?

वृद्धा–यह तो कुछ नहीं कह सकती; पर वह उत्तर ही की ओर गये हैं। तुमसे क्या कहूँ बेटा, मुझे तो उन्होंने प्राणदान दिया है, नहीं तो अब तक मेरा न जाने क्या हाल होता। नदी में स्नान करने गयी थी। पैर फिसल गया। महात्माजी तट पर बैठे ध्यान कर रहे थे। डुबकियाँ खाते देखा, तो चट पानी में तैर गए और मुझे निकाल लाये। वह न निकालते, तो प्राण जाने में कोई संदेह न था। महीने भर यहाँ रहे। इस बीच में कई जानें बचायीं। कई रोगियों को तो मौत के मुँह से निकाल लिया!

शंखधर ने काँपते हृदय से पूछा–उनका नाम क्या था, माताजी।

वृद्धा–नाम तो उनका था भगवानदास; पर यह उनका असली नाम नहीं मालूम होता था; असली नाम कुछ और ही था।

एक युवती ने कहा–यहाँ उनकी एक तसवीर भी तो रखी हुई है!

वृद्धा–हाँ बेटा, इसकी तो हमें याद ही नहीं रही
थी। इस गाँव का एक आदमी बम्बई में तसवीर बनाने का काम करता है। वह यहाँ उन दिनों आया हुआ था। महात्माजी तो ‘नहीं-नहीं’ करते रहे; पर उसने झट से अपनी डिबिया खोलकर उनकी तसवीर उतार ही ली। न जाने उस डिबिया में क्या जादू है कि जिसके सामने खोल दो, उसकी तसवीर उसके भीतर खिंच जाती है।

शंखधर का हृदय सतगुण वेग से धड़क रहा था। बोले–ज़रा वह तसवीर मुझे दिखा दीजिए, आपकी कृपा होगी।

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