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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
युवती लपकी हुई घर गयी और एक क्षण में तसवीर लिए हुए लौटी। आह! शंखधर की इस समय विचित्र दशा थी। उसकी हिम्मत न पड़ी कि तसवीर देखे। कहीं यह चक्रधर की तसवीर न हो! अगर उन्हीं की तसवीर हुई, तो शंखधर क्या करेगा? यह अपने पैरों पर खड़ा रह सकेगा? उसे मूर्च्छा तो न आ जाएगी? अगर यह वास्तव में चक्रधर ही का चित्र है, तो शंखधर के सामने एक नई समस्या खड़ी हो जाएगी। उसे अब क्या करना होगा? अब तक वह एक निश्चित मार्ग पर चलता आया था; लेकिन अब उसे एक ऐसे मार्ग पर चलना पड़ेगा, जिससे वह बिलकुल परिचित न था। क्या वह चक्रधर के पास जाएगा। जाकर क्या कहेगा? उसे देखकर वह प्रसन्न होंगे, या सामने से दुतकार देंगे? उसे वह पहचान भी सकेंगे? कहीं पहचान लिया और उससे अपना पीछा छुड़ाने के लिए कहीं और चले गए तो?
सहसा वृद्धा ने कहा–देखो बेटा! यह तसवीर है।
शंखधर ने दोनों हाथों से हृदय को सँभाले हुए तसवीर पर एक कम्पित दृष्टि डाली और पहचान गया। हाँ, चक्रधर ही की तसवीर थी। उसकी देह शिथिल पड़ गई, हृदय का धड़कना शान्त हो गया। आशा, भय, चिंता और अस्थिरता से व्यग्र होकर हतबुद्धि-सा खड़ा रह गया, मानो किसी पुरानी बात को याद कर रहा है।
वृद्धा ने उत्सुकता से कहा–बेटा कुछ पहचान रहे हो?
शंखधर ने कुछ उत्तर न दिया।
वृद्धा ने फिर पूछा–चुप कैसे हो भैया, तुमने अपने पिताजी की जो सूरत देखी है, उससे यह तसवीर कुछ मिलती है?
शंखधर ने अब भी कुछ उत्तर न दिया, मानो उसने कुछ सुना ही नहीं।
सहसा उसने निद्रा से जागे हुए मनुष्य की भाँति पूछा–वह उधर उत्तर ही की ओर गए हैं न? आगे कोई गाँव पड़ेगा?
वृद्धा–हाँ बेटा, पाँच कोस पर गाँव है! भला-सा उसका नाम है, हाँ साईंगंज, साईंगंज; लेकिन आज तो तुम यहीं रहोगे?
शंखधर ने केवल इतना कहा–नहीं माता, आज्ञा दीजिए, और खँजरी उठाकर चल खड़ा हुआ। युवतियाँ ठगी-सी खड़ी रह गईं। जब तक वह निग़ाहों से छिप न गया, सब-की-सब उसकी ओर टकटकी लगाए ताकती रहीं; लेकिन शंखधर ने एक बार भी पीछे न देखा।
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