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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


सामने गगनचुम्बी पर्वत अधंकार में विशालकाय राक्षस की भाँति खड़ा था। शंखधर बड़ी तीव्र गति से पतली पगडण्डी पर चला जा रहा था। उसने अपने-आपको उसी पगडण्डी पर छोड़ दिया है। वह कहाँ ले जाएगी, वह नहीं जानता। हम भी इस जीवन-रूपी पतली, मिटी-मिटी पगडण्डी पर क्या उसी भाँति तीव्र गति से दौड़े नहीं चले जा रहे हैं? क्या हमारे सामने उनसे भी ऊँचे अधंकार के पर्वत नहीं खड़े हैं?

४२

रात्रि के उस अगम्य अंधकार में शंखधर भागा चला जा रहा था! उसके पैर पत्थर के टुकड़ों से छलनी हो गए थे। सारी देह थककर चूर हो गई थी, भूख के मारे पैर कहीं रखता था, पड़ते कहीं थे; पर वह  गिरता-पड़ता भागा चला जाता था। अगर वह प्रात:काल तक साईंगंज न पहुँचा, तो सम्भव है, चक्रधर कहीं चले जाएँ, और फिर उस अनाथ की पाँच साल की मेहनत और दौड़-धूप पर पानी न फिर जाए। सूर्य निकलने से पहले वहाँ पहुँच जाना था, चाहे इसमें प्राण ही क्यों न चले जाएँ।

हिंस्र पशुओं का भयंकर गर्जन सुनाई देता था, अँधेरे में खड्ड और खाई का पता न चलता था; पर उसे अपने प्राणों की चिन्ता न थी। उसे केवल धुन थी–‘मुझे सूर्योदय से पहले साईंगंज पहुँच जाना चाहिए।’ आह! लाड़-प्यार में पले हुए बालक, तुझे मालूम नहीं कि तू कहाँ जा रहा है! साईंगंज की राह भूल गया। इस मार्ग से तू और जहाँ चाहे पहुँच जाये, पर साईंगंज नहीं पहुँच सकता।

गगन मण्डल पर उषा का लोहित प्रकाश छा गया। तारागण किसी थके हुए पथिक की भाँति अपनी उज्जवल आँखें बन्द करके विश्राम करने लगे। पक्षीगण वृक्षों पर चहकने लगे, पर साईंगंज का कहीं पता न चला।

सहसा एक बहुत दूर की पहाड़ी पर कुछ छोटे-छोटे मकान बालिकाओं के घरौंदे की तरह दिखाई दिए। दो-चार आदमी भी गुड़ियों की सदृश चलते-फिरते नज़र आए। वह साईंगंज आ गया। शंखधर का कलेजा धक-धक करने लगे। उसके जीर्ण शरीर में अद्भुत स्फूर्ति का संचार हो गया, पैरों में न जाने कहाँ सक दुगुना बल आ गया। वह और वेग से चला। वह सामने मुसाफिर की मंजिल है। वह उसके जीवन का लक्ष्य दिखाई दे रहा है! वह इसके जीवन-यज्ञ की पूर्णहुति है! आह! भ्रांत बालक! वह साईंगंज नहीं है।

पहाड़ी की चढ़ाई कठिन थी! शंखधर को ऊपर चढ़ने का रास्ता न मालूम था, न कोई आदमी दिखाई देता था, जिससे रास्ता पूछ सके। वह कमर बाँधकर चढ़ने लगा।

गाँव के एक आदमी ने ऊपर से आवाज़ दी–इधर से कहाँ आते हो भाई? रास्ता तो पश्चिम की ओर से है! कहीं पैर फिसल जाए, तो २०० हाथ नाचे जाओ।

लेकिन शंखधर को इन बातों के सुनने की फुरसत कहाँ थी? वह इतनी तेज़ी से ऊपर चढ़ रहा था कि उस आदमी को आश्चर्य हो गया। दम-के-दम में वह ऊपर पहुँच गया।

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