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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
किसान ने शंखधर को सिर से पाँव तक कुतूहल से देखकर कहा–देखने में तो एक हड्डी के आदमी हो, पर हो बड़े हिम्मती। इधर से आने की आज तक किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी। कहाँ घर है?
शंखधर ने दम लेकर कहा–बाबा भगवानदास अभी यहीं हैं न?
किसान–कौन बाबा भगवानदास? यहाँ तो वह नहीं आए। तुम कहाँ से आते हो?
शंखधर–बाबा भगवानदास को नहीं जानते? वह इसी गाँव में तो आए हैं। साईंगंज यही है न?
किसान–साईंगंज! अ-र-र! साईंगंज तो तुम पूरब छोड़ आए। इस गाँव का नाम बेंदो है।
शंखधर ने हताश होकर कहा–तो साईंगंज यहाँ से कितनी दूर है?
किसान–साईंगंज तो पड़ेगा यहाँ से कोई पाँच कोस, मगर रास्ता बहुत बीहड़ है।
शंखधर कलेजा थामकर बैठ गया! पाँच कोस की मंज़िल, उस पर रास्ता बीहड़। उसने आकाश की ओर एक बार नैराश्य में डूबी हुई आँखों से देखा और सिर झुकाकर सोचने लगा–यह अवसर फिर हाथ न आएगा! अगर आराध्यदेव के दर्शन आज न किए, तो फिर न कर सकूँगा। सारा जीवन दौड़ते ही बीत जाएगा। भोजन करने का समय नहीं, और विश्राम करने का भी समय नहीं। बैठने का समय फिर आएगा। आज या तो इस तपस्या का अन्त हो जाएगा, या इस जीवन का ही! वह उठ खड़ा हुआ।
किसान ने कहा–क्या चल दिए भाई? चिलम-विलम तो पी लो।
लेकिन शंखधर इसके पहले ही चल चुका था। वह कुछ नहीं देखता, कुछ नहीं सुनता, चुपचाप किसी अन्ध शक्ति की भाँति चला जा रहा है। बसन्त का शीतल एवं सुगन्ध से लदा हुआ समीर पुत्र-वत्सला माता की भाँति वृक्षों को हिंडोले में झुला रहा है, नवजात पल्लव उसकी गोद में मुस्कुराते और प्रसन्न हो-होकर ठुमकते हैं, चिड़ियाँ उन्हें गा-गाकर लोरियाँ सुना रही हैं, सूर्य की स्वर्णमयी किरणें उनका चुम्बन कर रही हैं। सारी प्रकृति वात्सल्य के रंग में डूबी हुई है, एक ही प्राणी अभागा है, जिस पर इस प्रकृति वात्सल्य का ज़रा भी असर नहीं! वह शंखधर है।
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